सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 35, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 35

[Page Header]
[ १६ ]

वर्धमानेश ( रा० २ : १२३ ) एवं ज्येष्ठेश आदि का उल्लेख करता है । ( रा० १ : १२४ )
अग्रहार : उसने अनेक अग्रहारों, विहारों, चैत्यो, शालाओ एवं स्तूपों का उल्लेख किया है । उनमें
अधिकांश का पता लगाया जा चुका है । कल्हण उनके स्थानों का ठीक पता देता है । इससे पता चलता है
कि कल्हण ने स्थानों की खोजकर उनकी तालिका बनायी थी । वे समस्त काश्मीर मण्डल में फैले थे ।
कल्हण ने तीन अग्रहारों का वर्गीकरण किया है । राजकीय अग्रहार ( रा० ३ : १०० ) द्विज
परिषद् अग्रहार ( रा० १ : १८७ ) तथा व्यक्तिगत पुण्य कार्य के लिये किये गये अग्रहार । कुछ अग्रहार
गान्धार देशीय तथा कुछ काश्मोरी ब्राह्मणो को दिये गये थे । राजा कनिष्क ने समस्त काश्मीर का दान कर
दिया था । ( रा० १ : २५७ ) मिहिरकुल जैसे क्रूर राजा ने भी एक सहस्र अग्रहारों का दान किया था ।
( रा० १ : ३१४ )
कल्हण ने तरंग १-३ में राजाओं द्वारा दिये गये अग्रहारों का उल्लेख किया है । राजा लव ने लेवार
( रा० १ : ८७ ), कुरु ने कुरुहार ( रा० १ : ८८ ), सुरेन्द्र ने सोनमृग, खागी ( रा० १ : ९० ) गोधर
ने गोधर, हस्तिशाला, जालोर ( रा० १ : ९६ ) शचीनर ने समांगासा तथा सनार ( रा० १ : १०० )
जलोक ने वारवल ( रा० १ : १२१ ) अभिमन्यु ने कष्टकोत्स ( रा० १ : १७४ ) गोपादित्य ने खोल,
रागिका, स्कन्दपुर समाजस ( रा० १ : ३४० ), तथा गोप ( रा० १ : ३४१ ) वश्चिक ( रा० १ : ३४३ )
रानी वाक्पुष्टा ने कनीमृग, रामुष ( रा० २ : ५५ ) तथा मेघवाहन ने मेघवन ( रा० ३ : ८ ) अग्रहार
का दान किया था ।
विहार : राजाओं ने जितने अग्रहारो का दान इस काल में किया था, उससे कम विहारों की
स्थापना नहीं की थी । इस काल मे सनातन धर्म तथा बौद्ध धर्म दोनों की मान्यतायें प्रायः समान थी । लोग
दोनों धर्मों की बातें मानते थे । राजा सुरेन्द्र ने नरेन्द्र भवन विहार ( रा० १ : ९३ ) सौरस विहार ( रा०
१ : ९४ ), जनक ने जालोर ( रा० १ : ९८ ), अशोक ने धर्मारण्य, ( रा० १ : १०३ ), जलोक ने
कृत्योधम ( रा० १ : १०७ ), जुष्क ने जुष्कपुर ( रा० १ : १६९ ), अमृतप्रभा ने अमृत भवन विहार
( रा० ३ : ९ ), खादना रानी ने खादना .विहार ( रा० ३ : १४ ), सम्मा रानी ने सम्मा विहार (
रा० ३ : १४ ), रानी बिम्बा ने बिम्बा विहार ( रा० ३ : ४६४ ), गलून ने रत्नावली विहार ( रा० ३ : ४७६ )
निर्माण कराया था । इनके अतिरिक्त सहस्रों विहार काश्मीर में थे । इसी काल में अनेक राजाओं ने चैत्य
एवं स्तूपों का भी निर्माण कराया था । अशोक ने शुष्कलेत्र तथा वितस्ताव में स्तूप निर्माण कराया था ।
( रा० १ : १०२ ), रानी अमृत प्रभा ने स्तोन्पा स्तूप ( रा० ३ : १० ) तथा इन्द्र देवी ने इन्द्रभवन स्तूप का
निर्माण कराया था । ( रा० ३ : १३ ) अशोक तथा कनिष्क ने स्तूपों तथा चैत्यों की श्रृंखलाओं से काश्मीर
मण्डल को आच्छादित कर दिया था ।
चतुर्थ बौद्ध परिषद : सम्राट कनिष्क के समय में चतुर्थ
होने का उल्लेख बौद्ध पर्यटकों तथा ग्रन्थों द्वारा मिलता है ।
थी । सम्पूर्ण त्रिपिटक को ताम्र-पत्रों पर लिपिबद्ध कर, माह
हरवान के प्रसंग में करता है । परन्तु उसने इस ऐतिहा-
है कि बौद्ध धर्म की मान्यता शनैः शनैः क्षीण होती .. ।
हाक्षादि भूल गये थे ।