राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 210, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग १२७
शतमन्युः शान्तमन्योगो॑त्रभिद्रोत्ररक्षिणः ।
लेभे यस्य सुरेन्द्रस्य सुरेन्द्रो नोपमानताम् ॥ ९२ ॥
९२. इन्द्र सुरेन्द्र १ की इस सुरेन्द्र से तुलना नहीं हो सकती क्योंकि सुरेन्द्र शतमन्यु अर्थात्
शतक्रोधी था और सुरेन्द्र शान्त मन्यु अर्थात् शान्त क्रोध था। यह सुरेन्द्र गोत्र अर्थात् पर्वत रक्षक
था और वह सुरेन्द्र गोत्रभिद् अर्थात् पर्वत संहारक था।
कश्मीर के बाहर विदेश नहीं भेजता। कश्मीर में
हिन्दू धर्म का प्रभाव था। सुरेन्द्र स्वयं धार्मिक राजा
था। उसके लिए यह संभव नहीं हो सकता था कि
वह अपनी एक मात्र सन्तान का विवाह एक विधर्मी
से कर देता। ईरान के राजा ने उस पर आक्रमण
नही किया था। एक सौदागर के कहने और एक
हकीम से संदेश सुनकर, राजपुत्री को विवाह के लिए
भेज देना तर्क सम्मत नही मालूम होता। यदि वह
अपनी कन्या का विवाह करना स्वीकार करता तो
दो राज्यों के विवाह सम्बन्ध के अनुसार पिता किंवा
वर स्वयं एक दूसरे के यहाँ आकर करते। कश्मीर
मण्डल के चारो ओर हिन्दू राज्य था। कन्या के
लिए वर मिलना कठिन नहीं था। राजा सुरेन्द्र
अपना राज्य कैसे दूसरे कुल में, अपनी कन्या ईरान के
राजा को देकर, जाना पसन्द करता, कुछ बात दिमाग
में बैठती नहीं। हसन अथवा मुस्लिम इतिहास-
कारों के दिमाग में मुस्लिम काल की बातें याद
आई होंगी। जहाँ लड़कियाँ छोटे राजाओं के यहाँ
से खूबसूरती की शोहरत सुनने पर मँगा ली
जाती थी। उनका धर्म परिवर्तन कर विवाह कर
लिया जाता था। यह सब मनगढ़न्त और
इतिहास पर दूसरा रंग देने का विचित्र प्रयास
किया गया है, जो कल्पना तथा मानव-प्रवृत्ति के
परे की बात है।
(२) दीर्घवहिष्कृतः—इसका श्री स्टीन ने
दो प्रकार से अनुवाद किया है।—उसका एक
अनुवाद उन्होंने किया है—'जिसने कि इन्द्र के राज्य
को भी मात कर दिया था—।'
पाठभेद :
श्लोक संख्या ९२ में 'सुरेन्द्रो नोपमानदाम्' का
पाठभेद 'न सुरेन्द्रः समानताम्' तथा 'यस्य' का
'तस्य' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
८२(१) सुरेन्द्र—सुरेन्द्र का अर्थ यहाँ इन्द्र है।
दोनों सुरेन्द्रों के आचरणों की तुलना कल्हण ने
की है। उसने राजा सुरेन्द्र को 'शान्तमन्यु' अर्थात्
शान्त क्रोध और इन्द्र को 'शतमन्यु' अर्थात् 'सैकड़ों
से क्रुद्ध' कहा है। इन्द्र को पर्वत नाशक अर्थात्
गोत्रभिद् और सुरेन्द्र राजा को गोत्र रक्षक अर्थात्
पर्वत का रक्षक कहा है। कश्मीर मण्डल पर्वतीय
क्षेत्र है। पर्वत द्वारा आवृत है। अतएव कल्हण ने
सुरेन्द्र को पर्वतीय कश्मीर का रक्षक कहा है।
उत्तर वैदिक साहित्य में वर्णन है। पर्वतों को
पंख होते थे। वे उड़ते थे। एक स्थान से दूसरे
स्थान पर उड़कर बैठ जाते थे। जनता तथा भूमि नष्ट
हो जाती थी। इन्द्र ने पर्वतों का पंख काट दिया।
उस समय से पर्वतों का उड़ना बन्द हो गया। पूर्व
वैदिक साहित्य के अनुसार इन्द्र को गोत्रभिद् कहा
गया है। वैदिक कथानक के अनुसार गोत्रपर्वत का
भेद किया था जिससे जल मुक्त होकर निकला।
इन्द्र का निवासस्थान स्वर्ग है। राजधानी अमरा-
वती है। नन्दन उद्यान है। ऐरावत श्वेत हाथी है।
अश्व उच्चैः श्रवा है। सारथि मातलि है, धनुष शक्र-
धनुष है। तलवार का नाम पेरेज है।
क्षत्रिय राजाओं की उपमा प्रायः इन्द्र से दी
जाती है। भारतीय राजतन्त्र का सिद्धान्त इन्द्र की
कल्पना पर आधारित है। इन्द्र स्वर्ग का राजा है।
पृथ्वी का राजा क्षत्रिय है, मनुष्य है। अतएव इन्द्र
की तुलना पृथ्वो के श्रेष्ठ राजाओं से की जाती है।