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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 175, कुल 984 में से

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पृष्ठ 175

९४ राजतरंगिणी
अष्टषष्ट्यधिकामब्दशतद्वाविंशतिं नृपाः ।
अपीपलंस्ते कश्मीरान् गोनन्दाद्याः कलौ युगे ॥ ४८ ॥
४८. कलियुग काल में गोनन्द तथा उसके उत्तराधिकारी राजाओं ने दो हज़ार दो सौ छियासी वर्षों तक काश्मीर मण्डल का राज्य किया ।
भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तेयेति विमोहिताः ।
केचिदेतां मृषा तेषां कालसंख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४९ ॥
४९. इस काल गणना को भ्रम के कारण कतिपय इतिहासकार इसलिये ठीक नहीं मानते। उनकी धारणा है कि महाभारत का युद्ध द्वापर के अन्त में हुआ था।
लब्धाऽऽधिपत्यसंख्यानां वर्षान् संख्याय भूभुजाम् ।
भुक्तात् कालात् कलेः शेषो नास्त्येवं तद्विवर्जितात् ॥ ५० ॥
५०. यदि उन राजाओं का राज्य काल जिनको वर्ष काल ज्ञात है योग किया जाय तो कलियुग के व्यतीत हुए काल में से कुछ शेष नहीं बचता, जैसा कि निम्नलिखित पंक्तियों से ज्ञात होगा।
पाठभेद : ग्यारह ऐतिहासिक ग्रन्थ उपलब्ध नहीं हैं। कल्हण
श्लोक संख्या ४६ में 'भुजवनतरु' का पाठभेद ने उनके नाम का उल्लेख नहीं किया है। केवल
'भुजतरुवन' मिलता है । ग्रंथ-संख्या दी है।
श्लोक संख्या ४७ में 'स्वप्नेऽप्य' का पाठभेद ऐतिहासिक प्रमाणों के अभाव में प्राचीन ग्रन्थ-
'सर्वोऽप्य' मिलता है । कारों को कश्मीर के ५२ राजाओं के चरित्र तथा
इतिहास का ज्ञान नहीं था। गोनन्द आदि चार
श्लोक संख्या ४८ में 'कश्मीरान्' का पाठभेद राजाओं का वर्णन कल्हण ने नीलमत पुराण के
'काश्मीराम्' मिलता है । आधार पर किया है।
श्लोक संख्या ४९ में 'भारतम्' का पाठभेद महाव्रती पाशुपत संप्रदायवादी कवि हेलाराज
'युद्धम्' मिलता है । द्विज ने १२ सहस्र श्लोकों की 'पार्थिवावली' नामक
ग्रन्थ की रचना की थी। हेलाराज वाक्यपदीय
श्लोक संख्या ५० में 'नास्त्येवम्' का पाठ
भाष्य के लेखक हैं। उनका काल प्रामाणिक तौर
'नास्त्येव' मिलता है। 'वर्जितात्' तथा 'वर्जनात्'
पर निश्चित नहीं कहा जा सकता है। अनुमान
मिलता है ।
लगाया जाता है। वे नवीं अथवा दसवीं शताब्दी में
पादटिप्पणियाँ : हुए थे। हेलाराज ने गाथाओं, लोकोक्तियों तथा
५० (१) कल्हण ने अपने पूर्ववर्ती इतिहासकारों जनश्रुतियों के आधार पर राजाओं के वृत्तान्त का
के ११ ग्रन्थों का अध्ययन किया था। उसे नीलमत के संकलन किया था। राजाओं के नामों का सम्बन्ध
विचारों का अध्ययन किया था। देव मन्दिरों, नगरों, किसी न किसी मन्दिर, मूर्ति, अग्रहार, तथा ग्रामों
ताम्रपत्रों, शासनपत्रों, प्रशस्ति पत्रों एवं अन्यान्य से रहा होगा। उनके साथ कोई न कोई गाथा जोड़
शास्त्रों के अध्ययन से अपना भ्रम दूर कर, उसने दी गयी होगी, अतएव हेलाराज ने इतिहास उन
राजतरंगिणी लिखने में हाथ लगाया था। उक्त आधारों पर लिखा होगा ।