राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८८ राजतरंगिणी
सोष्मस्नानगृहाः शीते गुष्यत्तीरगङ्गाऽस्पदा गये।
यादोविरहिता यत्र निम्नगा निरुपद्रवाः ॥ ४० ॥
४०. यहाँ जल जन्तुओं से विहीन निरुपद्रव सरिताओं के रम्य१ तीर पर हैं और शीत
ऋतु में स्नान निमित्त उष्ण२ स्नानगृह बने हैं।
तथा धर्मभीरुता दोनों आचरणों पर प्रकाश डालता
है। वास्तव में काश्मीर इस दृष्टि में अपने गौरव
का सानी नहीं रखता। भारत के पराधीन होने
पर भी लगभग तीन शताब्दी तक हिन्दू राज्य
कश्मीर में कायम रहा। कश्मीर को विदेशी अथवा
विदेशी मुसलिम राजाओं ने नहीं जीता था।
अन्तर्देशीय झगड़ों के कारण अपने ही लोगों के
कारण हिन्दू राज्य हटाकर काश्मीरी मुसलिम राज्य
कायम किया। सोलहवीं शताब्दी अर्थात् लगभग तीन
शताब्दी तक यहाँ का शासन काश्मीरी मुसलिम
बादशाहों के हाथों में रहा। ये बाह्य मुसलिम
सेना का सर्वदा सामना करते रहे। अकबर के
समय बाहरी मुसलिम शासन काश्मीर में स्थापित
हुआ था। महमूद गजनो जैसे योद्धाओं को
काश्मीरियों ने लोह कोट के पीछे हटाया था साथ ही
वे बड़े धार्मिक भी थे। हिन्दू और मुसनमान काश्मीरी
आज भी बहुत धर्म प्रिय हैं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४० में 'गुष्यतीर' का पाठ
भेद 'श्शुष्यत्तीरा' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
४०(१) सुस्थ तार पद : वितस्ता नदी तीर-
स्थित तीर्थस्थानो, जलाशया पर स्नान, पूजन, मार्जन,
अभिषेक निमित्त पत्थर के घाट प्राचीन काल
से बनाये जाते रहे हैं। काशी, मथुरा, नासिक,
हरद्वारके घाट प्रसिद्ध हैं। नगर के लोग स्नान
निमित्त घाटो पर जाते हैं। काश्मीरी भाषा में
घाट को यारवल कहते हैं। जहाँ यार अर्थात् मित्र
मिलते हैं।
घाट नगर के सार्वजनिक जीवन में महत्त्वपूर्ण
स्थान रखते हैं। घाटो पर कथा वार्ता, पूजा-पाठ,
सन्ध्या वन्दन, श्राद्ध, तर्पणधर्म, स्नान, वस्त्र प्रक्षालन,
दीप दान, पुण्यदान, धर्मदान, सभी कुछ दैनिक,
दैहिक, भौतिक कर्म किये जाते हैं।
४० (२) स्नानगृह : कल्हण ने मन्दिरों के
जुड़ी गुप्य रचना का भी उल्लेख (रा० त०
८।७०६) राजतरंगिणी में दिया है। उन्हें
काष्ठ मण्डप कहा जा सकता है। ये नदी तट पर
बने रहते थे। काशी में काष्ठ मण्डप के स्थान पर
स्नान के पश्चात् स्त्रियों के वस्त्र बदलने के लिए
घाटों पर पत्थरी मढ़िया के बनाने की प्रथा थी।
और है। नवीन घाट निर्माण के समय उनके रचना
पर विशेष ध्यान रखा जाता है। वहीं-वहीं पर
स्त्रियों के वस्त्र बदलने तथा जल में स्नान के लिए
लकड़ियों के मण्डप बनाये जाते हैं। काशी में आज
कल टिन तथा लोहे के स्नानगृह पोता पर बनाये जाते
हैं जो पानी पर तैरते रहते हैं। और नदी के उतार
चढ़ाव के समय भी इसमें ऊपर नीचे उठते रहते हैं।
कल्हण के समय स्नात निमित्त काष्ठ मण्डप
बनाने का संकेत प्रमाणित करता है कि बन्द स्थान
में लज्जा तथा शीत की रक्षा करते हुए, स्नान की
व्यवस्था थी। काश्मीरियों के विकसित सांस्कृतिक
जीवन का यह द्योतक है। तत्कालीन सामाजिक
जीवन काफी विकसित हो चुका था। कल्हण स्नान
गृह का पुनः उल्लेख तरंग आठवें में करता है।
सरित्स्नानगृहे स्नान्तो वृद्धाः शौण्डनियोगिनः ।
राजवेश्मान्यगणिता नाम मात्र नृपात्मजाः ॥
—रा० : ८ : ७०६
गर्म स्नानगृह अथवा हमाम कश्मीर के
शीतकालीन सामाजिक जीवन में विशेषस्थान
रखता है। स्नान क्रिया मार्जन के लिए वैयल