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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 984 में से

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पृष्ठ 166

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प्रथम तरंग ८५

[Left Column]
विशोका विजयेशं च वितस्तासिन्धुसंगमम् ।
एतान् सर्वानतिक्रम्य प्रययौ भरतं गिरिम् ॥
1056 : १२४०
विजयां मात्रतः स्नात्वा वितस्तायां महीपते ।
रुद्रलोकमवाप्नोति कुलमुद्धरते स्वकम् ॥
9303 : १५१६
विजयेश्वर होकर मैं दो-तीन बार गया हूँ।
परन्तु कभी नगर के अन्दर नहीं गया था। उस
समय मुझे इस पवित्र स्थान का महत्त्व मालूम नहीं
था। यह बनिहाल श्रीनगर की सड़क पर श्रीनगर से
२९ मील पर स्थित है। नगर वितस्ता के वाम तट
पर है। नगर में बिजली तथा पाइप द्वारा पानी
दिया जाता है। इस समय यहाँ पर एक नवीन पुल
का और निर्माण हो गया है। पुराना डोगराकालीन
पुल भी कायम है। पुराने पुल से गाड़ियाँ नहीं जा
सकतीं। नवीन पुल द्वारा गाड़ी बड़ी ट्रक, बस तथा
सभी कुछ का परिवहन हो सकता है। इस समय
यहाँ ग्रामीण औद्योगिक स्टेट राजकीय विभाग द्वारा
बनाया गया है।
नगर बड़ा है। पुरानी शैली का है। गलियों
में पत्थर के फर्श लगे हैं। पक्की सड़कें हैं। शहर
की जमीन बहुत ऊँची-नीची है। समभूमि पर नगर
नहीं आबाद है। पुराने पुल द्वारा नगर का अभूत-
पूर्व दृश्य मिलता है। शहर वितस्ता तट पर ऊँचे
कगार किंवा करार पर बसा है।
यहाँ अत्यन्त प्राचीन काल से पुरानी शैली का
संस्कृत विश्वविद्यालय था। संस्कृत का अध्ययन-
अध्यापन होता था। शारदा पीठ के पश्चात् संस्कृत
शिक्षा का काश्मीर में यह दूसरा केन्द्र था। इस
समय कुछ घर ब्राह्मणों के बचे खुचे रह गये हैं।
काश्मीर के इतिहास में विजयेश स्थान का अपेक्षा-
कृत अधिक वर्णन मिलता है। यथास्थान उसका
उल्लेख किया गया है।
विजबैहरा या बिजत्रोर में अशोक ने दो मन्दिर
निर्माण कराये थे। इनका उल्लेख राजतरङ्गिणी में

[Right Column]
मिलता है। मन्दिर का नाम अशोकेश्वर राजा
अशोक के नाम पर रखा गया है। यहाँ के खनन
द्वारा प्राप्त मूर्तियाँ खंडित कर इतनी विरूप कर
दी गयी हैं कि उनके विषय में साधिकार कुछ कहना
कठिन है।
अशोकेश्वर संज्ञा से प्रकट होता है कि अशोक
द्वारा शिव मन्दिर की स्थापना की गयी थी। यहाँ
से प्राप्त खण्डित मूर्तियाँ अशोक काल की हैं या
नहीं कहना कठिन है। सम्भव है कि यदि कुछ और
खनन कार्य किया जाय तो तत्कालीन स्थिति तथा
इतिहास पर अधिक प्रकाश पड़ेगा।
श्रीनगर संग्रहालय की मूर्ति ए जी १ गुप्त-
कालीन मूर्तिकला मालूम पड़ती है। सम्भवतः देवी
की मूर्ति है। केश विन्यास सुन्दर है। मूर्ति अलंकृत
है। कानों के वृत्ताकार कुण्डल कपोल के नीचे तक
झूलते हैं। मूर्ति खण्डित कुरूप है। पादविहीन है।
विष्णु मूर्ति ए जी ४ भी खण्डित है। ललाट पर
मुकुट है। मूर्ति ए जी १० विष्णु की है। वह विरूप
कर दी गयी है। उसे बुरी तरह से नष्ट किया गया
है। तोड़ने वाले ने अपने पूरे क्रोध का प्रदर्शन किया
है। मूर्ति वक्षस्थल तक प्राप्त है। उसके सम्बन्ध
में कोई मत निर्धारित करना कठिन है। विजयेश्वर
से महाराज अशोक से सम्बन्धित तत्कालीन बौद्ध
कला-कृतियाँ तथा मूर्तियाँ मिलनी चाहिए थी परन्तु
वे अब तक नहीं प्राप्त हो सकी है। सम्भव है किसी
मसजिद, जियारत अथवा कब्र के अन्दर पटी होगी।
खनन कार्य इसलिए कठिन मालूम होता है कि
जहाँ मन्दिर किंवा देवस्थान नष्ट किए गए थे। उन
स्थानों पर जियारतें, मस्जिदें तथा कब्रिस्तानो का
निर्माण कर दिया गया है। मूर्तियाँ खण्डित कर
गाड़ दी गयीं या उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर फेंक दिया
गया। इस समय उन्हें ढूंढ निकालना कठिन प्रतीत
होता है।
'विजयेश माहात्म्य' में अनेक तीर्थस्थानो का
वर्णन मिलता है। उनकी यात्रा विजयेश की यात्र