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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 984 में से

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पृष्ठ 154

यहाँ पृष्ठ का पंक्ति-दर-पंक्ति लिप्यंतरण प्रस्तुत है:

प्रथम तरंग ७३
स्वयम्भूर्यत्र हुतभुक् भुवो गर्भात् समुन्मिषन् ।
जुह्वतां प्रतिगृह्णाति ज्वालाभुजवनैर्हविः ॥ ३४ ॥
३४ स्वयम् अग्निज्वाला पृथ्वी गर्भ से निकल कर जैसे अपनी भुजाओं द्वारा होताओं की
हवि प्रतिग्रहण करती है ।

[बायाँ स्तम्भ]
चाहिए । नीलमत पुराण उनमें स्पष्ट भेद करता
है ।
सन्ध्या नदी :
भव्यायां नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।
सन्ध्याम् नाम नदीम् दृष्ट्वा मुच्यते सर्वकिल्विषैः ॥
—1252 : १४०१
सन्ध्या पुष्करिणी :
सन्ध्या पुष्करिणी त्वन्या पूर्वतुल्यफलप्रदा ।
अवगाह्य नरो भक्त्या पुण्याम् माह्मणकुण्डिकाम् ॥
—1287 : १४९९
पादटिप्पणियाँ :
३४ (१) स्वयंभू—यह ब्रह्मा के पुत्र हैं । इनसे
प्रजा की उत्पत्ति हुई है । ( मत्स्य पुराण : ३:३१ )
इनका शरीर धर्धनारी का था । एक भाग नारी
तथा दूसरा नर का था । ब्रह्मा ने एक ही शरीर
के दोनों भागों को अलग करने का आदेश दिया ।
उन्ही से मानव जगत् में नर एवं नारी का सृजन
हुआ है । नारी शरीर से सतरूपा तथा नर शरीर
से स्वयंभू हुए हैं । (मार्कण्डेय पुराण - ५०; विष्णु '
७:६; भागवत : ३:१२:५३ )
बाइबिल में वर्णित आदम तथा हौवा की कथा
इसमें मिलती है । उसमें भी वर्णन मिलता है । भगवान्
ने पहले आदम को पैदा किया । आदम की एक पसली
से हौवा स्त्री पैदा हुई । इस प्रकार आदम नर तथा
हौवा अर्थात् ईव नारी हुई ! उन्हीं से सृष्टि चली ।
स्थानीय ग्रामीण स्थान को 'सुयम' कहते हैं ।
यह स्थान 'नीच होम' ग्राम से आधा मील दक्षिण
पश्चिम दिशा में स्थित है । मच्छीपुर परगना में है ।
यहाँ पर ज्वालामुखी का प्रतिभास एक नीची
भूमि में बालू तथा भूमि के मध्य होता है । किसी
१०

[दायाँ स्तम्भ]
वर्ष इसमे से उष्ण वाष्प निकलने लगती है । स्थान
इतना गरम हो जाता है कि यात्री खाद्य की वस्तु
उस पर रख देते हैं । वह पक जाती है ।
श्री स्टीन सन् १८९२ में इस स्थान पर आये
थे । वहाँ वालों से उन्हें मालूम हुआ कि वाष्प
अथवा ज्वाला गत १५ वर्षों से नहीं निकली है ।
श्री स्टीन ने देखा । वहाँ के छिछले स्थान की भूमि
ईंट की तरह चमकीली तथा लाल थी । वह जली
मिट्टी की तरह थी । वह संकोर्ण विवर हल चला
जैसा मालूम होता था ।
सन् १८७६ में पण्डित गोविन्द कौल यहाँ की
तीर्थ यात्रा करने आये थे । उस समय इसकी यह
क्रिया लगभग दस मास तक चलती रही ।
वाइन ने अपने यात्रा विवरण में लिखा है । यह
आश्चर्यजनक प्रतिभास इस शताब्दी के आरम्भ में देखा
गया था ।
अबुलफजल ने आइने अकबरी ( २.३६५ ) में
लिखा है—पुरंगो के समीप एक दर्रा है । उसे सोयुम
कहते हैं । उसके छोर पर एक स्थान लगभग १०
जरीब के क्षेत्रफल में होगा । जिस समय बृहस्पति
सिंह राशि में प्रवेश करता है उस समय लगभग एक
मास तक भूमि इतनी गरम हो जाती है कि समीपवर्ती
वृक्ष सूख जाते हैं । यदि कोई पशु या पक्षी इस भूमि
पर रख दिया जाय तो भुन जायगा । इस स्थान के
समीप आबादी है । कमराज से जो दर्रा इस तरफ आता
है वह दूसरी तरफ कासगर से जाकर मिल जाता है ।
इसके पश्चिम तरफपक्तहे है जहाँ सोना मिलता है ।
मैं सन् १९६४ में इस स्थान पर आया था ।
उस समय यहाँ की भूमि गरम नहीं थी । स्थानीय
लोगों में यहाँ के सम्बन्ध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं ।