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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 152, कुल 984 में से

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पृष्ठ 152

प्रथम तरंग ७१
सन्ध्यादेवी जलं यस्मिन् धत्ते निस्सलिले गिरौ ।
दर्शनं पुण्यपापादामन्वयव्यतिरेकयोः ॥ ३३ ॥
३३. काश्मीर मण्डल के निःसलिल गिरि पर सन्ध्या देवी के जल धारण द्वारा प्रत्यक्ष प्रकट
होता है कि वहाँ पुण्य का अस्तित्व तथा पाप का अभाव है ।

[बायाँ स्तम्भ]
मैं गाँव में आकर ठहर गया । इन ग्रामीणों के
पूर्वज कभी इन मंदिरों के उपासक थे । उनके
पुरोहित लेकिन आज उस ओर उलट कर देखने में
हिचकते हैं । उपासकों के वंशज कहलाने में संकोच
करते हैं । बल्कि नापसन्द करते हैं ।
स्त्रियाँ काम कर रही थीं । मैं खड़ा हो गया ।
वे मक्के की वालों में दाने निकाल रही थी । ओखली
होती है । लम्बे मूसल होते हैं । ओखली में बाल
डालकर कूटती हैं । मक्के के दाने तथा खुखडी अलग
हो जाते हैं । वे हमें चकित होकर देखने लगी ।
खेलते बच्चे कुछ सहम कर खड़े हो गए । हमारा
मन यहाँ से हट जाने के लिये कहने लगा ।
गाँव में अखरोट के वृक्षों की बहुलता है । ग्रामीणों
का सीधा सादा सरल जीवन अच्छा लगा । वे शहरी
वातावरण से दूर थे । उनकी जीविका अखरोट,
शाली तथा मक्का की उपज पर निर्भर थी । अखरोट
का मौसम था । अखरोट घाम में सूखने के लिये
फैलाए गए थे । मुझे देखकर बच्चे अखरोट के पास
खड़े हो गये । बालजन्य दुर्बलता उनमें आ गई ।
कहो मैं अखरोट, उनकी एकमात्र सम्पत्ति उठा न
लूँ । मैं उन्हें देखकर मुस्कराया । चुपचाप उन्हें
देखने लगा । मूसल चलाती स्त्रियाँ जैसे कुछ समझ
न पाकर मूसल चलाना रोक कर मेरी ओर देखने
लगी । मैं कुछ बोलना चाहा । बोल न सका ।
अपनी राह पकड़ा ।
स्थान रम्य है । सुहावना.है । विकास करने
पर आदर्श पर्यटन केन्द्र बन सकता है । केन्द्र होने पर
स्थानीय निर्धन ग्रामीणों की आर्थिक दशा सुधर
सकती है । पर्यटकों को कश्मीर का, कभी का
भूला, एक तीर्थस्थान दर्शनार्थ मिलेगा ।

[दायाँ स्तम्भ]
पाठभेद :
श्लोक ३३ में 'धत्ते' की जगह 'दत्ते' पाठ भेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३३ (१) सन्ध्या देवी : सन्ध्या देवी ब्रह्मा की
मानस कन्या कही जाती हैं । यहाँ सन्ध्या देवी प्रसिद्ध
त्रिसन्ध्या निर्झर रूप में प्रकट होती है । वह उप-
त्यका के एक तरफ है । देवल गोम ग्राम के दक्षिण
दिशा में यह निर्झर है । यहाँ के एक लघु ग्राम का
नाम मुन्दब्रार है । ब्रार का अर्थ देवी होती है । यह
शब्द सन्ध्या का अपभ्रंश है । ग्राम अब निर्झर के
निकट है । इस निर्झर के समीप ही एक छोटा और
झरना सप्तर्षियों के नाम से सम्बन्धित है । किन्तु
चमत्कार के कारण त्रिसन्ध्या को ही विशेष महत्त्व
दिया गया है ।
सन्ध्या माहात्म में वर्णन मिलता है कि भद्रेश्वर
वतु के पुत्र माया वतु ने सन्ध्या गंगा को अपने
आश्रम देवल ग्राम के समीप लाया था ।
चमत्कार :
यह निर्झर ज्येष्ठ तथा आषाढ मास में तीन
बार दिन तथा तीन बार रात्रि में चलता है ।
त्रैकालिक सन्ध्या की उपमा झरने से दी गई है ।
निर्झर का त्रिसन्ध्या नामकरण किया गया है ।
अत्यन्त प्राचीन काल से यह कश्मीर का पवित्र
तीर्थस्थान रहा है । इसका उल्लेख नीलमत पुराण में
किया गया है । त्रिसन्ध्या माहात्म्य में उत्पत्ति उद्ग-
मादि का वर्णन मिलता है । झरना वर्ष में अधिक
दिनों तक सूखा रहता है । कश्मीर उपत्यका में
यह एक आश्चर्यजनक चमत्कार माना जाता है ।
कल्हण कपटेश्वर के पश्चात् इसका वर्णन करता है ।