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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 984 में से

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पृष्ठ 145

६६ राजतरंगिणी
यत्तार्क्यभीत्या प्राप्तानां नागानां गुप्तये ध्रुवम् ।
प्रसारितभुजं पृष्ठे शैलप्राकारलीलया ॥३१॥
३१. काश्मीर मंडल की प्राकार-स्वरूप पर्वतमालाएं जैसे भुजाएँ उठाये गरुड़ द्वारा ताड़ित
शरणागत नागों की रक्षा कर रही हैं।
भुक्तिमुक्तिफलप्राप्तिः काष्ठरूपमुमापतिम् ।
पापसूदनतीर्थान्तर्यत्र संस्पृशतां भवेत् ॥३२॥
३२. पापसूदन१ तीर्थ में काष्ठ-स्वरूप उमापति के दर्शन एवं स्पर्श द्वारा भोग तथा मोक्ष
दोनों फलों की प्राप्ति होती है।
अफगानिस्तान का एक वर्ग नागवंशी कहा जाता
है। बंगाल में एक वंश का पदगौरव नाग है। वे
अपने को नागवंशीय कहते हैं। बंगाल के नाग
महाशयों का गोत्र वासुकी नाग है। वासुकी नाग का
स्थान कश्मीर का भद्रवा अंचल है। विशेष अध्ययन
के लिए 'नाग' परिशिष्ट द्रष्टव्य है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३२ में 'काष्ठरूपम्' का 'कप-
टेश्वरम्' पाठभेद मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३२ (१) पापसूदन तीर्थ : वेरी नाग के लग-
भग १० मील दूर अरपथ उपत्यका में पापसूदन तीर्थ
स्थित है। पापसूदन तीर्थ का पवित्र जलकुंड कप-
टेश्वर नाम से पूजित होता है। काकर ग्राम के
निकट, परगना कुयर अर्थात् कपटेश्वर में एक अत्यन्त
निर्मल जलपूर्ण कुंड है। वह एक जलस्रोत को बाँध-
कर बनाया गया है। भगवान् शिव की कपटेश्वर
नाम से यहाँ पूजा होती है। ये यहाँ कपट अर्थात्
लकड़ी के रूप में जल पर तैरते प्रकट होते हैं। कप-
टेश्वर के सम्बन्ध में एक पुरानी गाथा है—
'शिव दर्शन के इच्छुक ऋषि तथा मुनिगण
दृषद्वती नदी के किनारे कुरुक्षेत्र में प्रस्थान किए।
रात्रि में उन्हें शिव ने स्वप्न दिया। झील के निकास
स्थान कश्मीर में वे जाँय। आनेपर उन लोगों ने
वहाँ केवल लकड़ी के टुकड़े देखे। उसे उन्होंने इधर
उधर फेंक दिया। कुछ समय पश्चात् कपटेश्वर में
जल वेग से निकलने लगा। उन्होंने उसमें
स्नान किया। स्नान करते ही ऋषि रुद्र हो गये।
केवल वसिष्ठ अर्थात् गोरपराशर को कुछ
कौतूहल हुआ। उन्होंने स्नान नही किया। वे उप-
वास करने लगे। उनका शरीर सूख गया।
शिव ने स्वप्न में उन्हें दर्शन दिया। उनसे वर
माँगने के लिये कहा। वसिष्ठ ने निवेदन किया—
'आप सर्वदा इस पवित्र जलाशय में काष्ठ के टुकड़े
तथा जल के रूप में निवास कीजिए। कलियुग में लोग
काष्ठ रूप आपका दर्शन तथा स्नान कर पाप मुक्त
हो जाँय।' शिव ने वर दिया। उसीके फल स्वरूप
कपटेश्वर में जल पूर्ण रहता है और काष्ठ रूप में
भगवान् प्रकट होते रहते हैं।
मालवराज राजा भोज ने पुष्कल धन व्यय कर
कपटेश्वर के कुंड का निर्माण कराया था। राजा
यहाँ के पवित्र जल द्वारा नित्य मार्जन करते थे।
उनकी यह प्रतिज्ञा थी। काँच कलश में कपटेश्वर
का जल प्रतिदिन कश्मीर से मालवा भेजा जाता
था। तत्कालीन कुंड निर्माण के भग्न विशाल शिला
खंड यहाँ यत्र-तत्र पड़े है।
गोलाकार कुंड है। शिला प्राकार द्वारा परि-
वेष्टित है। उन्नीस वर्गगज क्षेत्रफल होगा। इस तीर्थ
का उल्लेख नीलमत पुराण तथा हरिवरितामृत दोनो
मे है। उसी के आधार पर कपटेश्वर माहात्म्य की
रचना की गई है।