रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
पृष्ठ 716, कुल 735 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्लोकानुक्रमणिका
| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः |
| :--- | :---: | :---: | :--- | :---: | :---: |
| पञ्चमं लोकपालानाभूचुः | १७ | ७८ | पारसीकांस्ततो जेतुं | ४ | ६० |
| पञ्चवट्यां ततो रामः | १२ | ३१ | पार्थिवीमुदवहद्रघु | ११ | ५४ |
| पञ्चानामपि भूतानां | ४ | ११ | पिता पितृणामनृणस्तम | १८ | २६ |
| पणबन्धमुखान्गुणान् | ८ | २१ | पिता समाराधनतत्परे | १८ | ११ |
| पतिरङ्कनिषण्णया | ८ | ४२ | पितुः प्रयत्नात्स समग्र | ३ | २२ |
| पत्तिः पदातिं रथिनं | ७ | ३७ | पितुरनन्तरमुत्तर | ९ | १ |
| पयोघटैराश्रमबाल | १४ | ७८ | पितुर्नियोगाद्वनवास | १४ | २१ |
| पयोधरैः पुण्यजनाङ्ग | १३ | ६० | पित्रा दत्तां रुदन्न्रामः | १२ | ७ |
| परकर्मापहः सोऽभूद | १७ | ६१ | पित्रा विसृष्टां मदपेक्ष | १३ | ६७ |
| परस्पराक्षिसादृश्य | १ | ४० | पित्रा संवर्धितो नित्यं | १७ | ६२ |
| परस्पराभ्युक्षणतत्प | १६ | ५७ | पित्र्यमंशमुपवीतल | ११ | ६४ |
| परस्परा विरुद्धास्ते | १० | ८० | पुण्डरीकातपत्रस्तं | ४ | १७ |
| परस्परेण क्षतयोः | ७ | ५३ | पुत्रजन्मप्रवेश्यानां | १० | ७६ |
| परस्परेण विज्ञात | ४ | ७९ | पुत्रो रघुस्तस्य पदं | ६ | ७६ |
| परस्परेण स्पृहणीय | ७ | १४ | पुरंदरश्रीः पुरमु | २ | ७४ |
| परात्मनोः परिच्छिद्य | १७ | ५९ | पुरं निषादाधिपते | १३ | ५९ |
| पराभिसंधानपरं यद्य | १७ | ७६ | पुरस्कृता वर्त्मनि | २ | २० |
| परार्ध्यवर्णस्तरणोप | ६ | ४ | पुराणस्य कवेस्तस्य | १० | ३६ |
| परिकल्पितसांनिध्या | ४ | ६ | पुरा शक्रमुपस्थाय | १ | ७५ |
| परिचयं चललक्ष्य | ९ | ४९ | पुरा स दर्भाङ्कुरमात्र | १३ | ३१ |
| परेण भग्नेऽपि | ७ | ५५ | पुरुषस्य पदेष्वजन्मन् | ८ | ७८ |
| परेषु स्वेषु च क्षिप्तैर | १७ | ५१ | पुरुषायुषजीविन्यो | १ | ६३ |
| पर्णशालामथ क्षिप्रं | १२ | ४० | पुरूहूतध्वजस्येव | ४ | ३ |
| पर्यन्तसंचारितचा | १८ | ४३ | पुरूहूतप्रभृतयः | १० | ४९ |
| पवनस्यानुकूलत्वा | १ | ४२ | पुरोपकण्ठोपवना | ६ | ९ |
| पश्यावरोधैः शतशो | १६ | ५८ | पुरोहितपुरोगास्तं जिष्णु | १७ | १३ |
| पाण्ड्योऽयमंसार्पितलम्ब | ६ | ६० | पुष्पं फलं चार्तवमाह | १४ | ७७ |
| पात्रीकृतात्मा गुरुसेव | १८ | ३० | पूर्वजन्मधनुषा समा | ११ | ८० |
| पादपाविद्धपरिघः | १२ | ७३ | पूर्वं प्रहर्ता न जघान | ७ | ४७ |
४२ र० सम्पू०