रघुवंशम् (मल्लिनाथ संजीवनी व श्रीकृष्णमणि त्रिपाठी हिन्दी व्याख्या)
Raghuvamsham of Kalidasa Hindi
महाकवि कालिदास द्वारा
स्रोत: Raghuvamsham with Mallinatha Sanjivani & Hindi Commentary by Dr. Shrikrishnamani Tripathi (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें६४६ | रघुवंशमहाकाव्ये
| सर्गे | श्लोकः | | सर्गे | श्लोकः |
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| उपकूलं स कालिन्द्याः पु | १५ | २८ | ए | | |
| उपगतोऽपि च मण्डल | ९ | १५ | एकातपत्रं जगतः | २ | ४७ |
| उपचितावयवा शुचि | ९ | ४४ | एको दाशरथिः कामं या | १२ | ४५ |
| उपपन्नं ननु शिवं | १ | ६० | एतद्गिरेर्माल्यवतः | १३ | २६ |
| उपययौ तनुतां मधु | ९ | ३८ | एतन्मुनेर्मानिनि शात | १३ | ६८ |
| उपशल्यनिविष्टैस्तैश्च | १५ | ६० | एताः करोत्पीडितवारि | १६ | ६६ |
| उपस्थितविमानेन ते | १५ | १०० | एता गुरुश्रोणिपयोधर | १६ | ६० |
| उपस्थितां पूर्वमपास्य | १४ | ६३ | एतावदुक्तवति दाश | १३ | ६८ |
| उपहितं शिशिरादग | ९ | ३१ | एतावदुक्त्वा प्रतिया | ५ | १८ |
| उपात्तविद्यं विधिव | ५ | ३८ | एतावदुक्त्वा विरते | २ | ५१ |
| उपान्तयोर्निष्कुषितं वि | ७ | ५० | एते वयं सैकतभिन्न | १३ | १७ |
| उपान्तवानीरवनोप | १३ | ३० | एवं तयोक्ते तमवेक्ष्य | ६ | २५ |
| उपेत्य मुनिवेषोऽथ कालः | १५ | ९२ | एवं तयोरध्वनि | ५ | ६० |
| उपेत्य सा दोहददुःख | ३ | ६ | एवमात्तरतिरात्मसं | ११ | ५७ |
| उभयमेव वदन्ति | ९ | ३ | एवमाप्तवचनात्स | ११ | ४२ |
| उभयोरपि पार्श्ववर्ति | ८ | २९ | एवमिन्द्रियसुखानि | १९ | ४७ |
| उभयोर्न तथा लोकः | १५ | ६८ | एवमुक्तवति भीमदर्शने | ११ | ७९ |
| उभावुभाभ्यां प्रणतौ | १४ | २ | एवमुक्ते तया साध्व्या | १५ | ८२ |
| उमावृषाङ्कौ शरज | ३ | २३ | एवमुद्यन्प्रभावेण शास्त्र | १७ | ७७ |
| उरस्यपर्याप्तनिवेश | १८ | ४७ | एषा त्वया पेशलमध्यया | १३ | ३४ |
| उवाच धात्र्या प्रथमोदि | ३ | २५ | एषा प्रसन्नस्तिमित | १३ | ४८ |
| उषसि स गजयूथक | ९ | ७१ | एषोऽक्षमालावलयं | १३ | ४३ |
| ऋ | | | ऐ | | |
| ऋत्विजः स तथानर्घ्य दक्षि | १७ | ८० | ऐन्द्रमस्त्रमुपादाय | १५ | २२ |
| ऋूढापर्णं राजपथं स | १४ | ३० | ऐन्द्रिः किल नखैस्तस्या | १२ | २२ |
| ऋषिदेवगणस्वधाभु | ८ | ३० | ऐरावतास्फालनविशल | ६ | ७३ |
| ऋषीन्विसृज्य यज्ञान्ते | १५ | ८६ | क | | |
| ऋष्यशृङ्गादयस्तस्य | १० | ४ | कण्ठसक्तमृदुबाहु | १९ | २९ |
| | | | कण्डूयमानेन कटं | २ | ३७ |