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पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary

कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 327, कुल 330 में से

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पृष्ठ 327

३१० पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्.
'पृथिवीभटमुक्तवन्तमि-
त्यवदन्मानधरो महत्तमः . '
मिहिरो (l.19) [न्यगुणप्रकाशने]
परदोषावरणे महत्तमः ॥
स मानी महत्तम एवमुक्तवन्तं पृथिवीभटमित्यवदत्(l.20)·········
प्रकाशने सूर्यः परेषां दोषाच्छादने महानन्धकारः . 62.
विबुधश्च कविश्च शारदा-
य - - - - (l.21)[मण्डला¹?]द्वयम् .
निगमागमतीर्थतापस-
प्रथमोद्यागतवाञ्ज[यान]कः ॥
पण्डितः कविश्च तथा नि(l.22)·········[ज]यानकश्च [शारदा]क्षे-
त्रात्कश्मीरमण्डलादागतः ॥ 63.
युगपत्सुसं²(l.23) - - - - -

      • रुदेत्यमुष्य धीः .
        अमुनैव सुतेन शारदा
        गिरिकन्येव गुहेन नन्दति ॥
        सुमन(l.24**83) 64.
        [Six lines at the beginning of page missing]
        शशिखण्डशिखण्डमण्डनं
        प्रति निर्वेदनिवेदनं व्यधात् .
        ···········(l.7)या पूजया हेतुभूतया चन्द्रावचूडाभूषणं हरं प्रति
        बन्दी··············· ॥ 65.
        1 Ms. °न्दा°. 2 Ms. °सुप्त°.