पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)

पृथ्वीराजविजय महाकाव्यम् (कवि जयानक - अजमेर चौहान साम्राज्य एवं सम्राट् पृथ्वीराज इतिहास)
Prithvirajavijaya Mahakavya of Jayanaka with Commentary
कश्मीरी कवि जयानक (टीकाकार: जोनरराज) द्वारा
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३१० पृथ्वीराजविजयमहाकाव्यम्.
'पृथिवीभटमुक्तवन्तमि-
त्यवदन्मानधरो महत्तमः . '
मिहिरो (l.19) [न्यगुणप्रकाशने]
परदोषावरणे महत्तमः ॥
स मानी महत्तम एवमुक्तवन्तं पृथिवीभटमित्यवदत्(l.20)·········
प्रकाशने सूर्यः परेषां दोषाच्छादने महानन्धकारः . 62.
विबुधश्च कविश्च शारदा-
य - - - - (l.21)[मण्डला¹?]द्वयम् .
निगमागमतीर्थतापस-
प्रथमोद्यागतवाञ्ज[यान]कः ॥
पण्डितः कविश्च तथा नि(l.22)·········[ज]यानकश्च [शारदा]क्षे-
त्रात्कश्मीरमण्डलादागतः ॥ 63.
युगपत्सुसं²(l.23) - - - - -
-
-
- रुदेत्यमुष्य धीः .
अमुनैव सुतेन शारदा
गिरिकन्येव गुहेन नन्दति ॥
सुमन(l.24**83) 64.
[Six lines at the beginning of page missing]
शशिखण्डशिखण्डमण्डनं
प्रति निर्वेदनिवेदनं व्यधात् .
···········(l.7)या पूजया हेतुभूतया चन्द्रावचूडाभूषणं हरं प्रति
बन्दी··············· ॥ 65.
1 Ms. °न्दा°. 2 Ms. °सुप्त°.
- रुदेत्यमुष्य धीः .
-