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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 424

४१४ पृथ्वीराजरासो । [ नवां समय ३०
दूहा ॥ सहस पंच रन मीर परि । साथ सुषांन ततार ॥
परे हुसेन सुतीन सै । सै दो हिंदू सार ॥ छं० ॥ १५५ ॥ रु० ॥ ७५ ॥
गाथा ॥ नंदिय तीस कमंधं । करि झोरी दांन तत्तारं ॥
दिषिय रनसुर बदं । भय रसं अदभुत्त भयानं ॥ छं० ॥ १५६ ॥ रु० ॥ ७६ ॥
भग्गिय अनी षांन *ततारं । चंपियं जह्व मत्ता असवारं ॥
बज्जिय बर नीसानं । सज्जिय जुद्ध हिंदू सवानं ॥
छं० ॥ १५७ ॥ रु० ॥ ७७ ॥
खुरासान खां का आगे बढ़कर लड़ना ॥
छंद चोदक ॥ सजि संमुष षां षुरसान दलं । जग डंबर बंबर टान ढलं ॥
बजि भेरि नफेरि भयान सुरं । घननं किय घुघ्घर घंट घुरं ॥ छं० ॥ १५८ ॥
गजघोर निसानत घुंमरयं । दिग अट्ठ धरा घर घुंमरयं ॥
मिन्निवीय अनी दुअ आवधयं । भरवंछि उभै बल सावधायं ॥ छं० ॥ १५८ ॥
झर आवध आवध झाक झारं । कटि मंडल षंडल ढारि ढरं ॥
करि पेखहिं सेखहिं केस कसं । रस छोडू भयानक रुद्र रसं ॥ छं० ॥ १६० ॥
असि बंड विखंडति चैवरयं । गज सुंडच मुंड ढैरं धरयं ॥
धर लुल्लहि जुल्लहि रंधरयं । मिन्निवीय अनी दुअ आवधयं ॥ छं० ॥ १६१ ॥
झरयं फिर गिद्धय रोर रुजं । धर श्रोन प्रवाहनि पूर षलं ॥
करि डक्कच डक्कानि बीर नचै । सिर माल सु ईसर आनि सच ॥
छं० ॥ १६२ ॥
बर बीर भरै भर अच्छरियं । सुर रोर सकत्तिय मच्छरियं ॥
हनि चक्कचि षां षुरसान रिनं । द्रिग दिषिय चावंड राय तिनं ॥ छं० ॥ १६३ ॥
मिलि आवध सावध दुब्भरयं । घय घाय गुरज्जत सुझ्झरयं ॥
क्रमि चामंड संगिय झारि भारं । जुग फुटिय जानु चयं समरं ॥ छं० ॥ १६४ ॥
७५ पाठान्तर-हुसेन । सैं । दां । दोइ । हिंदू ॥
७६ पाठान्तर-नचीय । कमधं । दिषिय । । बदं । रस अदभूत । भायानं ॥
७७ पाठान्तर-भगीय । *अधिक पाठ इतर पुस्तकों में है और प्राचीन में वह है ही नहीं ॥
तत्तारं । चंपिय । वजीय । सजि । युद्ध । हिंदुसवांनं ॥