पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंनवां समय १६ ] पृथ्वीराज रासो । ४०३
दूतों का सुलतान को पृथ्वीराज के चढ़
आने का समाचार देना ॥
दूहा ॥ देखि चरित नृप साह चर । गए पास सुरतान ॥
कहै सेन संमुष रजै । चदि आयौ चहुआन ॥ छं० ॥ ८१ ॥ रु ॥ ५२ ॥
सुलतान का चढ़ाई के लिये धूम धाम से चलना ॥
दूहा ॥ सुनि चलि साहाय चर । दिय निरघोष निसान ॥
चयौ सेन सज्जे सिलह । करिव फौज सुरतान ॥ छं० ॥ ८२ ॥ रु ५३
सुलतान की चढ़ाई का वर्णन ॥
छंद मोतीदाम ॥ चल्यौ सुरतान सुसज्जिय फौज । बजे बर वज्जन बीर असोज ॥
भयौ गज घुंमर घंट निघोर । मनौ झुकिक्रंच भयौ सुर रोर ॥ छं० ॥ ८३ ॥
गजें गज मद् मनौ घन भद्द । चिकार फिकार भए सुर रुद्द ॥
तुरंग मचीस कडक्क लगाम । खरक्किय पप्पर तोन लुतांन ॥ छं० ॥८४॥ *
चमंकत तेज सनाह सनाह । करें धर पहर राह बिराह ॥
झनक्कत टोप झुटोप उतंग । मनौ रज जोति उद्योत विहंग ॥ छं० ॥ ८५ ॥
दमंकत तेज कमान कमान । चितं चित मीर रची महमान ॥
भले भर सांइय अंस सगत्ति । खपै धर जीवन जत्तिन गत्ति ॥ छं० ॥ ८६ ॥
नमैं निज सांइय पंच वषत्त । सिपारच तीस पढै दिन रत्त ॥
नमैं निज सेष धरम सरम । फमै रच रीति कुरान करम ॥ छं० ॥ ८७ ॥
दिढंबर बाचरु काकूह मीर । तर्फेनीय एक रत धर बीर ॥
सवध्य वेध करें तम तांह । भ्रमंतिय पंषि इनै छित छांह ॥ छं० ॥ ८८ ॥
धरै इक एक अनेक सुमान । झणक्कत मुंड तवल्लह मान ॥
धरै धर नाहिय स्याहिय सीस । सिरक्कचि चंबर घुमर दीस ॥ छं० ॥८९॥*
५२ पठान्तर-सुरतान । कहै । चहुवांन ॥
५३ पठान्तर-चरित्र । चरित । सहाब । निसांन । सजे । सज्जेह । सुरतांन ॥
*यह पद Caufield Mss. में नहीं है।