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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 32, कुल 470 में से

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पृष्ठ 32

आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासौ । १३
तंत बीर उग्रंत । रंग राजन सुख दाइय ॥
बाल केल प्रत्यंग । सुरनि उड्ढरि कविताइय ॥
अवलंब उकति उच्चार करि । जिचित्त सोच्चि कोविद् रचै ॥
सम ब्रह्मरूप या सबद कहुँ । क्यों उच्छिष्ट कवियन कथै ॥
कूं० ॥ १२ ॥ रू० ॥ ७ ॥
॥ चंद अपनी स्त्री की शंका का समाधान करता है ॥
कवित्त ॥ सम बनिता वर बंदि । चंद जंपिय कोमन्न कन्न ॥
सबद् ब्रह्म इह सत्ति । अपर पावन कंचि निर्मल ॥
जिह्वित सबद् नहिं रूप । रेख आकार व्रन्न नहिँ ॥
अलख अगाध अपार । पार पावन चयपुर महिँ ॥
तिहिँ सबद् ब्रह्म रचना करौं । गुरु प्रसाद सरसैं प्रसन ॥
जयपि सु उकति चूकौं जुगति । तौ कमल वदनि कवित्त हँसन ॥
कुं ॥ १३ ॥ रू० ॥ ८ ॥
॥ चंद की स्त्री पुनश्च शंका करती है ॥
कवित्त ॥ तुम वानी बरबंद । नाग देखंत विमल मति ॥
छंद भंग गन रचित । कंठ कौमार काव्य कृत ॥
पति, यह तीनों चंद की हिन्दी के संस्कृत - सम प्रयोग हैं । और तंत और मंत शब्दों के प्रयोग भी
दृष्टि देने जैसे हैं तंत पावन में तंत = तत्व और तंत मंत में तंत = तंत्र और मंत = मंत्र के वाचक
कवि ने प्रयोग किये हैं ॥
अन्य पुस्तकों में यह अशुद्ध पाठ हैं :- सु, जंपिय, कवि, सुख, दाईय, कविताईय, को, विद,
समब्रह्मरूप, कहुं, कविय और न ॥
८ चंद इस रूपक में अपनी स्त्री को उस की शंका का उत्तर देकर समाधान करता है । शब्दब्रह्म
(सं० शब्दात्मकं ब्रह्म) शब्द का प्रयोग चंद की व्याकरण और वेदान्त विद्या के ज्ञान का द्योतक
है । गुरुप्रसाद शब्द यहां श्लेषार्थ में कवि ने प्रयोग किया है क्योंकि ख्यातियों के अनुसार चंद के
विद्या-गुरु का नाम गुरुप्रसाद था । यद्यपि कुछ विशेष वृत्त नहीं मिलते तथापि यह गुरुप्रसाद
नामक पंजाब देश का रहनेवाला एक बड़ा पंडित हुआ है । कवित्तह चंद की हिन्दी का निज
प्रयोग है और उस का अर्थ कवित्त अर्थात् काव्य रचनेवाले कवि का है । किसी २ पुस्तक में जो
वरबंदि, अमल, अबल, चयपूर, महि, तिहि, और प्रसव पाठ हैं वे अशुद्ध हैं ॥
९ जिन पुस्तकों में यह पाठ हैं:- अभीय, सुनर, और समलहहि, वह अशुद्ध हैं इस में दूसरी
तुक का दूसरा पाद "कंठ कौमार काव्य कृत" विद्वानों के ध्यान देने जैसा है । इस का आशय यह