पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंहसम समय ६५ ] पृथ्वीराजरासौ । २४५
प्रजा प्रसंखत भेट दधि । चल लिए परसत पग्म ॥
षट गुन प्रभु बलिभद्र सम । हरि मिलि गोचर लग्ग ॥
छं० ४८१ ॥ रू० ॥ १७५ ॥
राज सुराजन मातुलह । मत लहि अतुल अपार ॥
कुवलय गज मुच लय मुदित । विदित वली दरबार * ॥
छं० ॥ ४८२ ॥ रू० ॥ १७६ ॥
दिठि दल दिन बालक विहसि । कुससिय कुसदिव गब्भ ॥
सुन रोचिन रोचित रिसह । दिठ दिग लग्गौ अभ्र ॥
छं० ॥ ४८३ ॥ रू० ॥ १७७ ॥
ब्रज सरनागत बसत व्रज । ब्रज कहि मंगै सग्ग ॥
हम गज दिट्ट निरष्यो । निसष उसारहु पग्ग ॥
छं० ॥ ४८४ ॥ रू० ॥ १७८ ॥
रिस लोचन रन रक्त किय । रक्तंभर ब्रजपाल ॥
रति रत कंस उदंसि सिष । किस पंचित निय काल ॥
छं० ॥ ४८५ ॥ रू० ॥ १७९ ॥
भुजंगी ॥ मदंक्कारि भूरंग रूपं गरज्जं । अहो बाल वालं तिवारं वरज्जं ॥
चयं वाद बहं पयं पीलुवानं । ठिन्नै टह नहे' जुधं जूझं आनं ॥ ४८६ ॥
कटिं पह पीतं सिरं स्याम सेखी । सिता नील दसनाय दसनाय केखी ॥
धरै ओरह्यं सुवज्जंत फूंलं । हसै विक्कसे मुष्य गेनं गद्दलं ॥ ४८७ ॥
गही सुंड सुंडीन षंडी अपारं । नटी जानि बंसी सुचुक्की विचारं ॥
पयं पात भूमी सुभूमी जु आनं । दिठी कंस लग्गी सुबज्जे निसानं ॥ ४८८ ॥
प्रन्जा । प्रसंखंत । भेंट । दधि । सत । पंग । पट्ट । गौचर । लग । १७५ । राजुन । राजन । मातुलह ।
मतु । कुंबलय । गजु । मुदिता । विदती । १७६ । दिनि । विहसि । गभ । रौहिनि । रौहित ।
रोदित । लगौ । अभ्र । १७७ । वृज । मंगे । मग । हमन । दिठन । नरपयौ । उधारहु । पग ।
१७८ । लोचन । रतकियै तक्किये । रतंवर । उदंस । किस । १७९ ॥
- हिं॰ दरबार (सं॰ दर or दरि, A natural or artificial excavation in a mountain, a
cave, cavern, a grotto &c. and बार A door-way, a gate.) Hence at door-way or gate. अर्थात
द्वार पर ॥
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