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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 247

दसम समय ५७ ] • पृथ्वीराजरासौ । २३७
दूहा ॥ रही रही हैं कन्ह ढिग । चल्यौ चलन नह जाइ ॥
मो इच्छो प्रिय प्रेम बर । लै चलि कंध चढ़ाइ ॥
॥ छं० ॥ ४१७ ॥ रु० ॥ १४७ ॥
गाथा ॥ वांछा रत सुजानं । ता चित्तं करन लोपनं नत्थी ॥
रत्तं बाल सुजानं । अप्पानं दाहए अग्गी ॥ छं० ॥ ४१८ ॥ रु० ॥ १४८ ॥
वप्पे गुन गाह्नानं । जं गुनप्पि मांइं बंधए चित्तं ॥
हीनं सूर कमोदं । औगुनं जुता दृकं ताईं ॥ छं० ॥ ४१९ ॥ रु० ॥ १४९ ॥
गाथा ॥ दुद्धं सक्कर जुत्तं । विनै सहितं तूरुव साधिककं ॥
पंथं निगम सु भ्रंमं । ते बाला देव मुकंदं ॥ छं० ॥ ४२० ॥ रु० ॥ १५० ॥
दूहा ॥ चित्त स्वामि तन वाम तन । जड़ भौ मन गुन जड़ ॥
गोवरधनधारी सुमन । अरु गोवरधन चड्ड ॥
॥ छं० ॥ ४२१ ॥ रु० ॥ १५१ ॥
संखेपक जंपी सु कथ । माधव माननि मज्झ ॥
जो चित चित्त विलंखियौ । (सो*) घरि घर विद्धन सुभ्झ ॥
॥ छं० ॥ ४२२ ॥ रु० ॥ १५२ ॥
इस रूपक के छंद के विषय में सर्वत्र यह ध्यान में रखना चाहिये कि कहीं तो इस को
गाथा और कहीं गाह्वा नाम से वर्णन किया है । वास्तव में यह छंद वह कहाता है कि जिसे
को संस्कृत में आर्या कहते हैं । इस के अनेक भेद हैं किन्तु विशेष करके मात्रिक छंद आठ ताल
और १२+१८ = ३० मात्रा अथवा १२+१५ = २७ मात्रा का होता है । चंद कवि के इस महा-
काव्य में इस छंद में विषमता के भेद भी दृष्टि पड़ते हैं अर्थात् कहीं २ उस के दूसरे और चौथे
चरण १५ वा १८ वा १६ । १७ आदि मात्रा के विषम भी होते हैं ॥
१४७ पाठान्तर :-दौहा । दूहा । हो । है। जाय । मौ । इको । दक्षो । प्रिय । पेम ।
“तो बूंदीवाली में अधिक पाठ है। लें । चढ़ाय ॥
१४८ पाठान्तर :-गाहा । रव । रत । चितं । करं न । लोपनं । नथि । रतं । सुं जांन
अपानं । दाहयै । अगि ॥
१४९ पाठान्तर :-चपै । चपे । गुण । गुणपि । गुनपि । माइं । माई । मांइ । बंधाए ।
औगुण । औगुन । जुत्तां । जितां । ताइ ॥
१५० पाठान्तर :-दुद्धं । दुरह्र । सकर । युतं । बिनय । चंरुव । साधिकं । पंथ । धृमं ।
बाला । मुकंद ॥
१५१ पांठान्तर :-दौहा । चित । स्वांमि । तवांम । भो । जड । जड: । गौवरधनधारी ।
गोवरदुन । चड ॥
१५२ पाठान्तर :-संक्षेपक्र । जंपिय । जंपीय । मांननि । मझ । जौ । चित्त । दित । विलं-
बियौ । (सो*) बूंदीवाली और सं० १७७० की पुस्तको में अधिक पाठ है अन्य में नहीं । विर्धन । सुझ ॥