पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३४ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय १४
दूहा ॥ सुत पति गुरजन बंचि वर । तजि ग्रिह काम प्रमान ॥
धुनि बंसी संभरि श्रवन । चलि सुंदरि तजि प्रान ॥
छं० ॥ ४०४ ॥ रु० ॥ १३४ ॥
दूहा ॥ सजि सिंगार नग नग उदित । मुदि मऊष ससि हीन ॥
मुदित दीप राका दिवस । काम कामना कीन ॥
छं० ॥ ४०५ ॥ रु० ॥ १३५ ॥
दूहा ॥ चंद दरस गोपी बदन । गयौ समीप सु सज्ज ॥
धरक हीन तन छीन मै । कला षोडसी अज्ज * ॥
छं० ॥ ४०६ ॥ रु० ॥ १३६ ॥
चौपाई ॥ फिरि फिरि चंद चंद विचारै । अन गैन उपम बल चारै ॥
घटि बढि पंच दिसा फिरि आयौ । कवि मुख तौ सामित्त करायौ ।
छं० ॥ ४०७ ॥ रु० ॥ १३७ ॥
कवित्त ॥ नगनि जोत उद्योत । बहुत सोहै बालं तन ॥
बिंद मगमद रज्जि । तिलक चिञ्चकै भालं घन ॥
अंग अंग की क्रांति । बाल ससि जोति प्रगासी ॥
छामी मग मारनैं । तिलक कैसार दृगासी ॥
जग जोति जुवति जौवन बनिय । कनिय ओर कामिनि कहिय ॥
ब्रजनाथ साथ गोपी मिलिय । राग रंग बंसी लंचिय ॥
छं० ॥ ४०८ ॥ रु० ॥ १३८ ॥
१३४ पाठान्तर :- बंचि । वर । गृह । प्रमानं । बंसी । श्रषनं । सुंदर । पांन ॥
१३५ पाठान्तर :- तजि । सिंगार । मयूष । शशि । मुदित । कांम ॥
१३६ पाठान्तर :- दरसि । सञ्जि । भञ्जि । संजि । भंजि ॥
- यह रूपक बूंदीवाली पुस्तक में नहीं है ॥
१३७ पाठान्तर :- अरिल । अरिल्लः । चंद वंद । विचारै । ग्रैन । गैन । मैन । गैन । उपम । हारे वढि । सामित । कहायौ ॥
१३८ पाठान्तर :- कवत्तः । कवितः । यैाति । ज्योति । उद्योत । सोहै । बालपन । बिंन ।
विन । मृग । मृगमद । रंजि । तलक । तलकि । बाल । सजि । जौति । प्रकासी । प्रागासी ।
कामी । मारनैं । हगांसी । जौति । युवति । जोवन । बनिअ । और । ब्रजनाथ । गौपी । राम ।
बंसी । बंसीय ॥