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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

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पृष्ठ 239

दसम समय ४६ ] पृथ्थीराजरासौ : २२६
दूहा ॥ जह्यां पत्तवर कृष्ण गुरु । चढि तमाल चरि वस्त्र ॥
मानहु सुंदरि अंग वर । करत सुमित्त पवित्र ॥ छं० ॥ ३७५ ॥ रु० ॥ ११४ ॥
कवित्त ॥ पीत वस्त्र सु निकंत । जलाखंबन तन दुति दुरि ॥
दीपक करि पुंडरिक । द्विग लगि गुंज सुत्ति हरि ॥
क्रिसन त्रिभंगी तन्न । धस्यौ किस्सोरति रूपं ॥
दिष्ट वाम मै कोटि । सोह माया तन ओपं ॥
आनंद कंद जुग चंद वद । वृंदावन वासी विचर ॥
दै वसन रसन तुहनन करि । देहि गारि तिय नंद पर ॥
छं० ॥ ३७६ ॥ रु० ॥ ११५ ॥
कुंडलिया ॥ धुनि वंसी सुनि सुनि श्रवन । चक चक्रित चित पाहि ॥
मन माया की पुत्तरी । रही स्वामि तन चाचि ॥
रही स्वामि तन चाचि । मदन दावानल बढ़ी ॥
मीन तनं तन फिरै । अबल व्याकुल भइ गढ़ी ॥
चित जल रचि पग परै । जलसायी सु सरूप सुनि ॥
निगम प्रमोद मृणाल (चरि*)। सो भइ वंसी वैन धुनि ॥
छं० ॥ ३७७ ॥ रु० ॥ ११६ ॥
दूहा ॥ वरषि कदम्म सु वन्न चढि । लज्जित बहु वर बाल ॥
हत्थ जोरि सम् सो भई । प्रभु बुल्लै बल्लपाल ॥
छं० ॥ ३७८ ॥ रु० ॥ ११७ ॥
११४ पाठान्तरः-दौहा । तहां । पतैबर । चटि । मांनहुं । मानहुं । सुंदर । बरत ।
सुमित । पवित ॥
११५ पाठान्तरः-कवित । कवित्तः । जलालंबत । करी । पुंडरोक । द्विग । गुत्ति । हरिः ।
मूत्ति हरि । क्रिसत । तनं । किसौकिरति । किसोरति । दिष्टि । वांम । कोटिचौ । सौह ।
औपं । उपं । बद । विचरं । तुट्टंनिम । तुटनिम । दैहि । देंहि ॥
११६ पाठान्तरः-कुडलिया । वंसी । चकं । पाइ । पाय । मनि । फुत्तरो । फूतरी । स्वांमि ।
दली । तिनंतन । फिरैं । अवल । भई । हुई । गठ । लत । लज्जति । परें । जल सु ईस रूपंच सुनि ।
प्रमोद निगम । मृताल । * अधिक पाठ । सौ । वंसी । वैंनि । वैनं ॥
११७ पाठान्तरः-दौहा । वरपि । कमोद । अधंन । लजित । वर । ह्य । जौरि । सौ ।
भइ । बुलल्यो । भुलै । भूले । कृपाल । वल्लपाल ॥
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