पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 235, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसम समय ४५ ] पृथ्वीराजरासौ । २२५
कवित्त ॥ क्रिष्ण विरह गोपिका । भई व्याकुल सु विकल मन ॥
वर गहवर बन भ्रमै । कै इक गट्टी ग्रिशलं तन ॥
विषम वाय जिम लता । मौरि मारुत झंफोरै ॥
कै चित्र छिपी पुत्तरी । जोरि जोरंत निहोरै ॥
कै पषान गढि केक मग । भ्रमत माल पुक्कृत फिरिय ॥
कवि चंद चवत हरि दरस बिन । दोय कपोतच्च विक्कुकुरिय ॥
छं० ॥ ३४८ ॥ रू० ॥ १०४ ॥
स्याम रंग पिष्पच्चिन । घटा घनघोर गरज्जत ॥
कोइल मधुकर वयन । श्रवन संभरै वरज्जत ॥
कालिंदी न्हावच्चि न । नयन अंजै न मृगंमद ॥
कुचा अग्र परसै न । नील दल कवल तोरि सद ॥
पर पीर अधीर न जानि मन । ब्रज वनिता मिलि कहत सब ॥
जिहि मग्ग कन्ह वन संचरिय । तिहि मग जल पीवच्चि न अब ॥
छं० ॥ ३४९ ॥ रु० ॥ १०५ ॥ *
दूहा ॥ सुतन दुष अति बाल ससि । भयौ पुरन बिन मंत ॥
तिम सुष घटि दुष्षच्च दरस । मोर भौर उडि जंत ॥
छं० ॥ ३५० ॥ रू० ॥ १०६ ॥
भयौ सु उडगन गात वर । पूरन ससिय अकास ॥
सुवर बाल वढ्ढैौति दुष । सिंधु उलहत्रो भास ॥
छं० ॥ ३५१ ॥ रू० ॥ १०७ ॥
१०४ पाठान्तर :-विरह । गौपिका । भई व्याकुलविकलं मन । बन गहवर वन भ्रमै । के ।
गढिय । गढी । यथलं । मौरि । झभैरै । के चित्र छिपी । फुत्तरी । जौरि । जौरितं । निहौरै ।
कैं । के । पषांन । कैक । भ्रमत । बाल । पुछत । फिरौय । बिनु । दाय । कपोतकि । विकुरिय ।
विकुरीय ॥
१०५ पाठान्तर :-स्यांम । पिष्यहिम । घोर । कोइलमं । वरज्जत । कालंढी । परसे । मील ।
तौरि । जांनि । वनिता । मग । कन्ह । वन । अल ॥
- यह रूपक सं०-१६४९ और १९१० की पुस्तकों में नहीं है ॥
१०६ पाठान्तर :-दौहा । सुनत । दुष । पूरन । तिम सुघट्टि दुष्पह दरस । सरस । ज्यों
भौर भौर उडि जंत ॥
१०७ पाठान्तर :-भयो । वर । समिय । शसिय । सुबर । बढ्योति । उलह्यो ॥