पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२१२ पृथ्वीराजरासौ । [ दसम समय ३२
प्राक्कार धरनि दसकंध हरि । पवन पूत अवधूत अर ॥
सर * करन लंक ल्यावन सती । थप्पन लंक अभीष वर ॥
छंदं ॥ २७१ ॥ रू० ॥ ६६ ॥
बंधि पाज बर बीर । लंघि साइर सु अष्ट कुल ॥
बय तरंग तपि तथ्य । भरे जनु अगस्ति (सु) † अंजुल ॥
सिर मच्छी ऊछरी । मनौ रचि मनि धर सेसं ॥
पिठ राम भर हनुअ । किन्न मन कारन भेसं ॥
चक चकित नाथ दस बेढ पुर । छोरि देव सेवन गय्य ॥
घर लंक सदा थप्पन सुथिर । अगच गहन हनुमंत भय ॥
छंदं ॥ २७२ ॥ रू० ॥ ६७ ॥
जब सु राम चढि लंक । तब सु मच्छी गिर तारिय ॥
जब सु राम चढि लंक । तब सु पथ्थर जल धारिय ॥
जब सु राम चढि लंक । तब सु चक चक्की चाचिय ॥
जब सु राम चढि लंक । तब सु लंका पुर दाचिय ॥
जब राम चढे दल बंनरन । भिरन राम रावन परिय ॥
भिर कुंभ मेघ राषिस रसन । सीत काम कारन करिय ॥
छंदं ॥ २७३ ॥ रू० ॥ ६८ ॥
उतरि समुद्द अथाव्ह । घाव लंका धुर धुज्जिय ॥
चल्लिय सेन रघुवंस । जोर सामंत सु सज्जिय ॥
सायर । कुलं । कुंलं । त्रिप तुरंत तिप तथ । भरै । अंचल । शिर । मच्छी । उबरी । मनौं । मनौ ।
सैसं । शेसं । पिठ । रांम । कीन । नैसं । चक्रित । वदनपुर । बदपुर । छोरि । देवन यह्य ।
एह्य । धर । थपन । आग मग । हनमंत ॥ ६७ ॥ रामं । रांम । मच्छी । गिरि । तारिरय ।
तारीय । रांम । लिंक । पत्थर । धारीय । रांम । चक्की । रांम । दाहीय । रांम । चढै । बंदरन ।
रांम । परीय । सीन ॥ ६८ ॥ उत्तरि । समुद । धुज्जि । सैन । रघुवंस । जो । ससज्जिय । ससाजिय ।
- इस शब्द का किसी पुस्तक में सर और किसी में सरु पाठ है । मैं इस का फारसी سر
शब्द से हिन्दी का बनना नहीं समझता हूं किन्तु संस्कृत सरः =गतौ । गमने ॥ भेदके । भेदने ॥
अथवा Sk. सरु=Thin, Small, minute. Hence conquest, victory, triumph. के अर्थ में कबि का
प्रयोग करना मानता हूं । बहुत से संस्कृत और हिन्दी शब्द ऐसे २ हैं कि जो उच्चारण और अर्थ
में फारसी और अरबी भाषाओं के शब्दों से मिलते जुलते हुवे हैं । क्या उन का अन्य देशीय
भाषाओं से ही उत्पन्न होना स्वीकार करना परम प्रशंसनीय है ? । † अधिक पाठ ॥