पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 214, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ेंदसम समय २३ ] पृथ्वीराजरासो । २०३
कवित्त ॥ सवा लाख वर विप्र । दियौ इक इक प्रति दानं ॥
दुरद अयुत रथ अयुत । एक हज्जार के कानं ॥
दासि दास दुय सहस । चरचि आभूषण अंबर ॥
साठि सहस मन कनक । अवर बहु भंति अडंबर ॥
असै कि जग्ग पूरन्न करि । निंनानू बन्नि राय जब ॥
वामन सरूप धरि चंद कहि । अप पधारि गोविंद तब ॥छं०॥२१७॥ रु०॥ ४४ ॥ *
दूहा ॥ बलि लग्यौ जुध इन्द्र सम । सुर आसुर मन षेध ॥
साचस संकर विष्णु वर । बेद सम्म्वर वेध ॥ छं० ॥ २१८ ॥ रु० ॥ ४५ ॥
॥ गीता मालची † ॥
लगेति बेधं वानवेधं, इंद्र वज्रं सज्जयं । कुहंत तारं नंपि भारं, काम कामं कज्जयं ॥
धमंकंत धारं वार पारं, मार मारं मुष्ण । संधेति वानं कर कमानं, कान तानं नष्ण॥२१८॥
विकसंत व्योमं सट्टि गोमं, भिरे भोमं धुज्जए। देवकी नंदं अरिनिकंदं, चले गंजन रज्जए॥
बलिराइ वट्ठिय देव दट्ठिय, इंद्र कट्ठिय आसुरे। मिलि तथ्य सथ्यं लथ्य चथ्यं पारि रथ्यं पासुरे ॥ २२० ॥
देवता मारे घन संघारे, चार भारे वल्लि जुरं। डक्कंत डक्कं पारि धक्कं, चारि थक्कं चैपुरं ॥
कुहंत पहं बान कुहं, तौन षुहं चच्चलं। बलिराय जग्गं मान मग्गं, भिरे भग्गं अचचलं ॥ २२१॥
४४ पाठान्तरः-दानं । दोय । वांमन । धारिं ॥
- यह रूपक हमारे पास की पुस्तकों में से सं० १६४७ और सं० १७९० और बूंदीवाली में
नहीं है किन्तु सं० १८५९ की लिखी हुई में है ॥
४५ पाठान्तरः-लगै। जुहु । ओसूर । मनि । पैध । विष्ण । पैध । समर । वैध । सम्मवर ॥
† इस रूपक के छंद के निर्णय को सहज में यों समझ लेना चाहिये कि जिस को इन
दिनों हरिगीत छंद कहते हैं, वह यह है। उसके नामान्तर इस महाकाव्य के पाठान्तरों से विदित
ही हैं तथापि The Revd. Joseph Van. S. Taylor B. A. साहब ने इस को गोय नाम से लिखां
है । इस के चार चरण होते हैं, उनमें से प्रत्येक चरण में दो यति १६+१२ और २८ मात्रा होती
हैं, जिन में ९+७+१२ पर विश्राम और ८ ताल होते हैं ॥
४६ पाठान्तरः-गीता । मालती धुय्यैः । छंद गीतामालती । छंद माधुर्य्यः । छंद गीत मालती ।
लगेत । लगेत्त । पैदं । पेंध । बांन । वांन । वैधं । इद्रवज्ज । सभ्रयं । कुठंत । तार । भार । कांम ।
काम । धार । वारं । पार । मुषण । सधै । वांनं । नपरा । विहसंत । ब्योम । सठि । गोम । भिरे ।
भौमं । देवकीनंद । चले । रजए । बलिराय । बठिय । कठिय । दैव । दठिय । आसुरै । मिलितथ
सथं लथयथं पारि रषं पासुरै । दैवता । मारै । संघारै । भारै । युरं । जुर । डक्रहकंतडक्रं पारि
धक्रंहारि चक तैपरं । थ्यक्कं । कुदनं पट्ठं तौनषुटं बांन छुट्टं चवलं । कुंटंत पट्टं तीन युट्टं बान छुट्टं
चलं । बलिराय जंम मांग भंग भिरैमरां अचलं । बलिराय जगं भिरे मग्गं अंचलं । चौसठि । जोगं ।