सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 181, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 181

५७० उपसंहारिणी टिप्पण ।
१३ क्या संस्कृत भाषा के उन ग्रंथों में, कि जिनको पुरातत्ववेत्ता बारहवें शतक के पहिले के
बने हुए मानते हैं, ऐसे २ शब्द हमको प्राप्त नहीं होते हैं कि उन नाम के देश और मनुष्य
यूरोप आदि अन्य खंडों में आज भी विद्यमान है ? क्या विक्रमादित्यजी की “शकारि” पदवी
साधु संस्कृत भाषा की है ? क्या र.वल समरसीजी की आबू की प्रशस्तिके ४५ वें श्लोक में
“तुरुक्क” शब्द नहीं प्रयोग हुआ है ? क्या व्याकरण महाभाष्य से बहुत सी धातुओं के प्रयोग
द्वीपान्तरों में होना विदित नहीं होता है ? क्या महाभारत में पांडवों का यावनी भाषा में बात
करना नहीं लिखा मिलता है ?
१४ क्या वर्त्तमान समय के अच्छी हिन्दी लिखनेवालों में से कोई किसी विद्वत मंडली में
खड़े होकर यह कह सक्ते हैं कि चिट्ठी पत्री से लेकर ग्रन्थ. तक जो कुछ उन्होंने आज तक
हिन्दी भाषा में लिखे हैं उन सब की हिन्दी एक सी ही है अर्थात् उनके अनेक लेखों में से
ऐसे २ उदाहरण बिल्कुल नहीं मिल सकेंगे कि उनके किसी लेख में तो एक भी फारसी शब्द
नहीं आया होगा और किसी में अनेक फारसी शब्द प्रयोग हुए होंगे ? यदि पृथ्वीराज रासो की
भांति एक हजार वर्ष के पीछे कोई ऐसे हमारे स्वदेशीय बन्धु के ऐसे लेखों को हाथ में लेकर वाद
विवाद करें तो क्या दोनों पक्षकारों को प्रत्येक के अनुकूल तर्क नहीं मिल सकेंगी ? जब आज
ही. हम लोगों की यह दशा है कि कभी कैसी हिन्दी लिखते हैं और कभी कैसी तो फिर
प्राचीन समय के ग्रंथकर्त्ताओं में से जिसने यह स्पष्ट कह दिया है कि मैं कुरान की भाषा को
भी प्रयोग में लेता हूं उसको हम क्योंकर दोष दे सक्ते हैं क्या हम अनुमान नहीं कर सक्ते
कि प्राचीन ग्रंथकारों में से जिसने जैसी हिन्दी पसन्द कियी उसने वैसी ही लिखी है ?
१५ क्या आज कल के विद्यमान देशी राजसथानों में अस्मात्ते समय से अब तक मुसलमान बादशाह
सिपहसालार, सरदार, सौदागर, मोलवी मुल्ला और काज़ी आदि के नाम अपनी देश भाषा
हिन्दी और मृतः प्राय भाषा संस्कृतादि के होते हुए भी फ़ारसी अक्षरों और उसी भाषा में
चिट्ठी पत्री और फ़रमान खरीते आदि के लिखे जाने का प्रचार नहीं प्रचलित है ? क्या आज के
एक-छंकी अंग्रेजी राज्य शासन समय में भी राजपूताने के अंतरगत राज्यों से श्रीमान् वाइसराय
और गवर्नर जनरल साहब बहादुर के नाम उभय की विदेशी फ़ारसी भाषा और लिपी में
खरीते नहीं लिखे जाते हैं ? बहुत समय के व्यतीत होजाने पर जब कि वर्त्तमान समय के वृत्त
पुरातत्व संज्ञा से माने जावेंगे और वे ऐसे ही अलभ्य होंगे जैसे कि आज पृथ्वीराजजी के समय
के हैं तब फिर क्या उस समय के विद्वानों का वैसी ही तर्कों से कि जैसी से आज हम लोग
रासो में दोष देते हैं इन देशी राज्यों के इन फ़ारसी लिपी और भाषा में गवर्नमेंट हिन्द के नाम
लिखे हुए खरीतों को भी जाली समझना यथार्थ होगा ? क्या यह व्यवहार भी वर्त्तमान समय में
देशी राजसथानों में प्रचलित नहीं है कि जब गवर्नमेंट हिन्द के नाम खरीता लिखने का काम
पड़ता है तब फ़ारसी भाषा के विद्वानों को घेर घार कर, फ़ारसी कोषों में शब्दों को
ढूंढ़ ठांढ़ कर, और एकान्त में बैठ बाठ कर, कई दिनों तक अति परिश्रम कर के नहीं लिखे
जाते हैं; उसी तरह जब किसी मंदिर आदि की प्रशस्ति का काम पड़ता है तब वैसेही देशी
और विदेशी पंडितों को चाहे वे राज के नोकर हों अथवा नहीं परंतु उने घेर घार कर संस्कृत
भाषा में प्रशस्तियें नहीं लिखाई जाती हैं और जब किसी राजा की बिरदावली का कोई
कवित्त बनवाने का काम पड़ता है तब षट भाषाओं की भाषा से बिगड़ कर बनी हुई डिंगल
भाषा में काव्य नहीं रचवाया जाता है और जब लाट साहंब की पंधरावनी का उत्सव किया जाता