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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 178, कुल 470 में से

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पृष्ठ 178

उपसंहारिणी टिप्पणी । १६७
पुरुषाणामनीचानां संस्कृतं स्यात्कृतात्मनाम् । शौरसेनी प्रयोक्तव्या तादृशीनाञ्च योषिताम् ॥
आसामेव तु गाथासु महाराष्ट्रीं प्रयोजयेत् । अत्रोक्ता मागधीभाषा राजान्तःपुरचारिणाम् ॥
चेटानां राजपुत्राणां श्रेष्ठिनां चार्द्ध मागधी । प्राच्या विदूषकादीनां धूर्तानां स्यादवन्तिका ॥
योधनागरिकादीनां दाक्षिणात्या हि दीव्यताम् । शकाराणां शकादीनां शाकारीं संप्रयोजयेत् ॥
बाह्लीकभाषा दिव्यानां द्राविडी द्रविडादिषु । आभीरेषु तथाऽभीरी चाण्डाली पुक्कसादिषु ॥
आभीरी शाबरी चापि काष्ठपत्रापजीविषु । तथैवाङ्गारकारादौ पैशाची स्यात् पिशाचवाक् ॥
चेटीनामध्येनीचानामपि स्यात् शौरसेनिका । बालानां पण्डकानाञ्च नीचग्रहविचारिणाम् ॥
उन्मत्तानामातुराणां सेवे स्यात् संस्कृतं क्वचित् । ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य दारिद्र्योपस्कृतस्य च ॥
भिक्षुत्वन्ध्यरादीनां प्राकृतं संप्रयोजयेत् । संस्कृतं संप्रयोक्तव्यं लिङ्गिनीषूत्तमासु च ॥
देवीमन्त्रिसुतावेश्या स्वपि कैश्चित्तथोदितम् । यद्देशं नीचपात्रन्तु तद्देशं तस्य भाषितम् ॥
कार्य्या तश्चौत्तमादीनां कार्य्यो भाषाविपर्य्यः । योषित् सखीबालावेश्या कितवाप्सरसां तथा ॥
वैदग्ध्यार्थं प्रदातव्यं संस्कृतं चान्तरान्तरा ॥ सा०द० ४३२ ॥
इस बात की कुछ परीक्षा हम इस आदि पर्व्व में ही कर सक्ते हैं । देखिये रूपक ३३, ३६,
आदि शुद्ध संस्कृत भाषा में हैं और रूपक १६, २२, ४७, ५७, ५९, इत्यादि में षट्भाषाओं का
सादृश्य और नाटकों में प्रायः संस्कृतादि भाषाओं का सादृश्य है । इसी प्रकार हमारे पाठक
इन भाषा संबन्धी सब बातों को इस समय ग्रन्थ में अन्वेषण कर जांच देखें । यदि इस प्रकार
की परीक्षा करने पर सब विद्वानों की सम्मति में यही तुलेगा कि चंद कवि वज्र-मूर्ख था तौ
हम भी उस को-बड़ा-वज्र-मूर्ख कहने लगेंगे क्योंकि वह हमारा कोई संबन्धी नहीं है और न
हम को हमारे कहे का कुछ हठ है बरुक हमारा सिद्धान्त यही है कि सत्य का ग्रहण और
असत्य का त्याग । इस महाकाव्य की भाषा में दो एक वर्ष से एक यह भी बड़ी भारी शंका
लोगों ने खड़ी कियी है कि उस में आठ या १० दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द हैं और फारसी शब्द
अकबर बादशाह के समय से हिन्दी भाषा में मिले हैं अतएव यह महाकाव्य सं० १६४० से १६७०
के बीच में क्रित्रिम बना है । हम इस बात से बिलकुलही असहमत हैं और ऐसा अनुमान करने-
वाले को हम समझते हैं कि उसने न तौ यह पृथ्वीराज रासा कभी आदि से अंत पर्य्यंत अच्छी
तरह से पढ़ा है और न उसको ऐतिहासिक विद्या का पूरा २ बोध है क्योंकि यह अनुमान
बिलकुलही अदृढ़ और अपरिपक्व है । बरन अब तक के ऐतिहासिक शोधों के अनुसार हमारी
सम्मति में फारसी शब्दों का मेल हमारे भरतखण्ड की बोलचाल की भाषाओं में सातवें शतक
तक पाया जा सक्ता है कि फिर इस बारहवें शतक की हिन्दी भाषा की तौ क्याही कथा कहनी
है ! टुक विचार कर देखिये कि किसी देश की भाषा में अन्य देशीय भाषा के शब्दादि का मेल
बहुधा करके प्रथम बोलचाल की भाषा में ही हुआ करता है न कि किसी मृतः प्रायभाषा में
और वह विदेशियों के किसी देश में आने जाने, बसने बसाने, रहने सहने, मिलने मिलाने
वाणिज्य करने कराने राज्य के बदलने बदलाने, मत के बिगड़ने बिगड़ाने आदि के कारणों से ही
हुआ करता है । तदनन्तर आप नीचे लिखे कारणों को विचार कर देखिये और निर्णय कीजिये
कि चंद की हिन्दी में जो फारसी शब्दों के प्रयोग संबन्धी दोष दिये जाते हैं वह वास्तव में
यथार्थ हैं अथवा नहीं :-
१ पृथ्वीराज रासे के किसी भी समय में आठ या दस भाग में एक भाग के फारसी शब्द
नहीं हैं और जब प्रत्येक समय में नहीं हैं तब समय ग्रन्थ में भी न होना स्वतः सिद्ध है।