सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 176, कुल 470 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 176

उपसंहारिणी टिप्पण । १६५
सर्गान्ते भाविसर्गस्य कथायाः सूचनं भवेत् । सन्ध्या सूर्य्येन्दुरजनीप्रदोषध्वान्तवासराः ॥
प्रातर्मध्याह्न मृगया शैलर्तुवनसागराः । सम्भोगविप्रलम्भौ च मुनिस्वर्गपुराध्वराः ॥
रणप्रयाणोपयम मन्त्रपुत्रोदयादयः । वर्णनीया यथायोगं साङ्गोपाङ्गा अमी इह ॥
कवेर्वृत्तस्य वा नाम्ना नायकस्येतरस्य वा । नामास्य सर्गोपादेयकथया सर्ग नाम तु ॥
सा० द० ५५९ ॥
जब कि वह महाकाव्य के लक्षण के अनुसार वास्तविक् एक महाकाव्य है तो फिर उस के
रचनेवाले का भी साहित्यशास्त्र में एक अच्छा व्युत्पन्न महाकवि होना क्या अनुमान नहीं किया
जा सक्ता है ? जैसे कि इस महाकाव्य का विषय पृथ्वीराजजी चौहान और उन के समकालीन
यावदार्य राजकुलों के चरित्रों से संवलित् है वैसे ही उसका काव्य भी भिन्न २ प्रकार के छंदों से
विभूषित अनेक प्रकार के काव्यों का एक ऐसा संवलित काव्यात्मक है कि जिस को हम किसी
एक प्रकार के काव्य की संज्ञा प्रदान नहीं कर सक्ते हैं । उसके काव्य को श्राव्य-काव्य की संज्ञा
देने में तो हम आशा करते हैं कि किसी विद्वान को भी कुछ शंका न होगी किन्तु सूक्ष्मतर अन्वेषण
करने से ज्ञात होगा कि उस में दृश्य-काव्य के अनेक अंगों का भी कवि ने अपनी सूक्ष्मतर युक्तियों
से ऐसा समावेश किया है कि उस को कोई दृश्य-काव्य का अच्छा व्युत्पन्न परीक्षक झट शोधकर
जान सक्ता है । क्या हम यह नहीं विचार सक्ते कि इस महाकाव्य के छंदों को कवि ने रूपक के
नाम से क्यों गिने हैं ? इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से यहां तक भी स्पष्ट विदित हो
सक्ता है कि महाकवि चंद ने उसको काव्य की अनेक उत्तमताओं के इन तीन मूलों से भी भले
प्रकार विभूषित किया है । प्रथम तो महाकवि ने अपने वचन का शृंगार, रस, अनुप्रास, और
अलङ्कारादिक से परम विचित्र किया है। दूसरे उसने भाव में योज रक्खा है। तीसरे इस महाकाव्य
के सब छंद प्राचीन और नवीन प्रकार की गानविद्या के अनुसार गाये भी जा सक्ते हैं । इस के
अतिरिक्त महाकवि ने पृथ्वीराजजी और उनके समकालीन यावदार्य राजकुलादि के इतिहास भी
जहां तक उस से हो सके हैं भले प्रकार से वर्णन किये हैं। हिन्दी भाषा में साहित्यशास्त्र और
सब पौराणिक अनुवाद विषयक ग्रंथ जो अब तक प्राप्त हो सके हैं वह बारहवें शतक के अथवा
उस के पहिले के नहीं है किन्तु वे सब इधर के समय के रचित हैं अतएव हम को समझना
चाहिये कि चंद ने संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों के आधार से ही यह महाकाव्य रचन किया है
और जब कि यह बात ऐसे ही है, तो फिर हमको उस के परम परिश्रम के लिये कितना आभारी
होकर उसकी प्रशंसा करना चाहिये । क्या हमको इस महाकाव्य की सूक्ष्मतर परीक्षा करने से चंद
की उक्ति, साहित्यशास्त्र विषयिक नियम, और पौराणिक कथा आदि में उसका संस्कृत भाषा के
अनेक विद्या ग्रन्थों का अनुकरण करना नहीं दृष्टि आता है ? जहां तक हिन्दी भाषा के ऐसे
अनेक ग्रंथ कि जो चंद के पीछे के रचित हैं हमारे पढने में आये हैं, उन सब से यही ज्ञात होता
है कि उनके रचनेवाले चंद कवि जैसे संस्कृत भाषा से भले प्रकार परिज्ञात नहीं थे और उनों ने
चंद की शैली का ही निःसंदेह अनुकरण किया है । हमारे कहने का सारांश यह है कि इस
महाकाव्य को उसके अति क्लिष्ट और हमारी बुद्धि को चल विचल कर देनेवाला होने के कारण
निन्दनीय नहीं ठहराना चाहिये किन्तु साहित्यशास्त्रादि के संस्कृत भाषा के अनेक ग्रंथों को हाथ
में लेकर और अपने हृदय को चारण और भाटादि के वंश परंपरा के हाड-बैर के दुराग्रह से शुद्ध
करके सूक्ष्मतर परीक्षा करनी चाहिये कि उस से हमको निःसंदेह यह ज्ञात हो जावेगा कि हमारे
स्वदेशी और यूरोपियन बड़े २ विद्वान जो इस महाकाव्य की प्रशंसा अब तक करते चले आये हैं
वह वास्तव में वैसा ही अमूल्य महाकाव्य है और वह ऐसा भी है-कि मानों चंद अपने समय