पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
पृष्ठ 174, कुल 470 में से
संदर्भ में पढ़ें॥ उपसंहारिणी टिप्पणी ॥
यद्यपि इस महाकाव्य के महाकवि चंद बरदाई ने इस आदि पद्य का उपसंहार अपनी
निज काव्य-रचन-शैली के अनुसार ३८५ रूपक से लेकर ४१३ तक में बड़े गूढ़ार्थ के साथ वर्णन
कर दिया है परंतु यह भी उचित और अत्यावश्यक है कि हम भी हमारी शैली के अनुसार
हमारी टिप्पणी के उपसंहारार्थ कुछ थोड़ा सा अपने पाठकों की सेवा में सविनय निवेदन करें कि
जिस से सर्व साधारणों को हिन्दीभाषा के इस महाकाव्य का कुछ स्वरूप-ज्ञान हो ॥
इस महाकाव्य का नाम पृथ्वीराजरासो है और यह दो शब्दों से मिलकर बना है अर्थात्
पृथ्वीराज और रासो। इस संज्ञा का अर्थ यह होता है कि "पृथ्वीराज का रासो"। ग्रंथकर्त्ता ने
पृथ्वीराज नामक संज्ञा से, हमारे उन पृथ्वीराजजी चौहान को अपने इस महाकाव्य का नायक
[ग्रंथ-संज्ञा] वर्णन किया है, कि जो विक्रम के बारहवें शतक में हमारे स्वदेशी अंतिम राजरा-
जेश्वर अर्थात् बादशाह हुए हैं; कि जिन की शूरवीरता का अभिमान आज तक
प्रत्येक आर्य को है, और जिन के नाम का ओटा रात्रिदिन की बोल चाल में हमारे देश के सर्व
साधारण दिया करते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं है कि वे एक कैसे बड़े कट्टर आर्य और
शूरवीर राजा हुए हैं; कि जिनों ने सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी को कई बार घोर युद्ध कर २
के पराजित किया था परंतु होनहार परम बलवान होती है कि जिस से अचिंतित घटनां भी
झट उपस्थित हो जाती है। देखो, ईश्वरही की इच्छा हिन्दुओं की बादशाहत स्थिर रखने की
न थी, कि दैवयोग से पृथ्वीराजजी चौहान जैसे शूरवीर राजा, सुलतान शहाबुद्दीनजी गोरी के
हाथ से, अपनी अंतिम लड़ाई में, अंत को प्राप्त हुए। वह भी फिर कैसे-कि वे हिन्दुओं की
बादशाहत के सब ठाठ पाटरूपी सर्वस्व को मानो अपने साथ ही लोकान्तर में लेगये और जगत
को यह निर्देश कर गये कि लौकिक में जो प्रायः यह कहा करते हैं कि किसी के अंत समय उसके
साथ कुछ नहीं जाता है यह एक प्रकार से असत्य है-अब रहा हिन्दी रासो शब्द वह संस्कृत
रास अथवा रासक से है और संस्कृत भाषा में रास के "शब्द, ध्वनि, क्रीडा श्रृंखला, विलास,
गर्जन नृत्य और कोलाहल आदि" के अर्थ और रासक के काव्य अथवा दृश्यकाव्यादि के अर्थ
परम प्रसिद्ध हैं। मालूम होता है कि ग्रंथकार ने संस्कृत भारत शब्द के सदृश रासो शब्द को
भावार्थ से महाकाव्य के अर्थ में ग्रहण कर प्रयोग किया है। यह रासो शब्द आज कल की ब्रज
भाषा में भी अप्रचलित नहीं है किन्तु अन्वेषण करने से वह काव्य के अर्थ के अतिरिक्त अन्य
अनेक अर्थों में भी प्रयोग होता हुआ विद्वानों को दृष्टि आवेगा, जैसे:-"हमने चौदैके गदर को
एक रासो जोड़ौ है-कल बहादर सिंघजी की बैठक में चंदर नैं गदर कौ रासो गायो हो-फिर मैं
ने भरतपुर के राजा सूरजमल को रासो गायो सो सब देखते ही रह गये-अंजी ये कहा रासो
है-मैं तो कल्ल एक रासे मैं फंस गयौ या सूं तुम्हारे वहां नाँय आय सक्यौ-अजी रामगोपाल
बड़ौ दिवारिया है, वाके रासे में फंस कैं रुपैया मत बिगाड़ दीजो-हमने आज घिन कौ रासो
निमटांय दीनौ है-देखो साब! रासे के संग रासो है, बुरो मत मानौं"-तथा लुगाइयें भी गाया
करती हैं।