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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 159, कुल 470 में से

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पृष्ठ 159

१४८ पृथ्वीराजरासो । [ आदि पर्व
संक्षेप विरद उच्चार कीन । क्यौं सकौं जंपि मो बुद्धि छीन ॥
सुनि राइ दान संज्यौ अपार । है गै सु वस्त्र द्रव्या न पार ॥ छं० ॥ ७१२ ॥
सब सहर नारि श्रृंगार कीन । अप अप्प झुंड मिलि चलि नवीन ॥
थपि कनक थार भरि द्रव्य दूब । पट कूल जरफ जर कसी ऊब ॥ छं० ॥ ७१३ ॥
अछ्छित अनूप रोचन सुरंग । मृदु कमल हास लोइन कुरंग ॥
इक जात मद्धि इक फिरत गेह । पचिराइ परस पर बढत नेह ॥ छं० ॥ ७१४ ॥
दरबार भीर बरनी न जाइ । सुगंध वास नासा अघाइ ॥
बिगसंत बदन छत्तीस बंस । जदुनाथ जन्म जनु जदुन वंस ॥
छं० ॥ ७१५ ॥ रु० ॥ ३६३ ॥
हरें । स्तून । श्चत्र । दिलिय । दिल्लिय । मंडे । बूंदीवाली में=चालीस वर्ष तिन मांस साज ।
चालीस । पुहवि । हरे । भूम । संप । भूम । वर्णीय । वरनीय । अष्ट बल । लेइ । व्यांहि । हुंनग ।
ढुंग । थैपि । चाहि । विश्र्द्र । उचार । सकौ । जपि । मै। । सुंनि । राय । दांन । हय । गाय ।
द्रव्यान । च्चय्राम । श्रंगार । झंड । नवान । कुंल । कल । उब्ब । अक्षित । रौचन । लोइन । कुरंग ।
जाय । मधि । येह । नैह । जाय । सुगंध । नाशा । अघाय । विगसत । छत्रीस । यदुनाथ । यदुन ।
जैसे कवि चंद रूपक ३५५ और ३५६ में अपनी प्राचीन गूढ भाषा के गूढार्थ में
पृथ्वीराजजी का जन्म संवत् वर्णन कर आया है; वैसे ही यहां भी वह इन रूपक ३६२ और ३६३
में उन की जन्मपत्री तथा उस के ग्रहों का फलादेश वर्णन करता है । इन दोनों रूपकों के पाठ जहां
तक हमारे पास की पुस्तकों से शुद्ध सके वहां तक हमने शोध दिये हैं; कि उन के इतने ही
शुद्धने पर जो कई एक शंका अब तक लोग करते थे वह दूर हो गई । और जो इसी तरह
और भी कुछ प्राचीन पुस्तकें मिल जावैं और उन से यह रूपक फिर शोध दिये जावैं तो आशा है
कि इन रूपकों में लिखी ज्योतिष शास्त्र संबन्धी सब बात मिल जावैं और विद्वानों की जो २
शंका अब भी बाकी रहती हैं वह भी निवारण हो जांय । इस के अतिरिक्त हमारे पाठक यह
अच्छी तरह जानते हैं कि इस रासे जैसी भ्रष्ट लिखित प्राचीन पुस्तकों में अथवा वैसे ही कोई २
बड़े प्रतापी मनुष्यों की जन्मपत्री अथवा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार जिस का कुछ अन्वेषण किया
जावे ऐसा कुछ विषय हम को वर्त्तमान समय में कहीं लिखा हुआ प्राप्त होता है उस को
यथायोग्य रीति से शोध लेना कैसा कठिन है । उस में भी फिर चंद की जैसी गूढार्थ की
कठिनता और ज्योतिष शास्त्र के सिद्धान्तियों के मतान्तर पर दृष्टि दियी जावे तो प्रत्येक सज्जन
मनुष्य सुख पूर्वक कह सकता है कि यह कार्य बहुत ही कठिन है और जो कदाचित् ऐसी
कठिनता का कुछ पता लगा सकें तो हमारे स्वदेशी जगत विख्यात ज्योतिष शास्त्राचार्य पंडित
वर श्री बापूदेवजी शास्त्री अथवा उन के शिष्य वर्ग में से भी कोई लगा सक्ते हैं; किन्तु अन्य के
वश का यह कार्य नहीं है । इस जन्मपत्री को शोधने के लिये हमने बड़ा परिश्रम कर रक्खा है
अर्थात् जितने पाठान्तर रासे की भिन्न २ पुस्तकों में से मिलते जाते हैं और जितनी भिन्न २
प्रकार की पृथ्वीराजजी की जन्मपत्रियें भरतखंड में से मिलती हैं वह भी एकत्र किये जाते हैं
और ब्रह्मगुप्त का रचित ज्योतिष शास्त्र का पुस्तक भी प्राप्त करने का उद्योग कर रहे हैं, कि