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सर्वकोश
पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 156, कुल 470 में से

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पृष्ठ 156

[ आदि पर्व ] पृथ्वीराजरासो । १४५
॥ सोमेश्वरजी के अपूर्व तप से पृथ्वीराजजी उत्पन्न हुए ॥
श्लोक ॥ सोमेश्वर मच्चावाहो । तस्यापूर्व तपो गुणैः ॥
तेने पुण्यं जगज्जेता । गर्भान्ते पृथुराजकम् ॥ छं० ॥ ६८६ ॥ रू० ॥ ३५७ ॥
॥ सोमेश्वरजी को राव (वेन) को बधाई देना ॥
पहरी ॥ अनगेस पुत्रि हुअ पुत्र जन्म । विज्जन्न चमक जनु मेघ घन्म ॥
बधाइ राव * सोमेश दीन । इक सहस हेम हय हुकम कीन ॥ छं० ६८७ ॥
को गुन कर लिया है (लिख्यो विप्र तुन गुप्त) क्या चंद यह अमूल्य पुरातत्व इस रूपक में नहीं
कहता है? नहीं-हम को निःसंदेह यही कहता हुआ दृष्टि आता है!! यदि यहां धर्मसुत
का अर्थ युधिष्ठिर का ग्रहण हो सक्ता है तो हमारे देशी महाकवि का विक्रम से युधिष्ठिर
तक का ११०० अथवा १११५ वर्ष का अंतर मानना मिस्टर वैन्टली साहब के अनुमान ११२३ के से
बहुत मिलता हुआ है अर्थात् उस में केवल २३ अथवा ८ वर्ष का ही अंतर है । और यह
हमारे स्वदेशी काल-निरूपकों की गणना से भी मिलता हुआ है क्योंकि ११०० अथवा १११५
युधिष्ठिर से चेमक तक तथा उम से विक्रम तक ११०० अथवा १११५ और विक्रम से पृथ्वीराजजी
तक ११०० अथवा १११५ और इस गणना के अनुसार ८१४ कलि गत में युधिष्ठिर हुए । तथा
चंद के कहे विप्रगुप्त कि जिस को हम ब्रह्मगुप्त होना अनुमान करते हैं उस के विषय में मिस्टर
वैन्टली साहब यह कहते हैं कि वह विक्रमी ५८३ तदनुसार ५२० ई० में हुआ था । उस ने
ब्रह्म-कल्प की गणना का प्रकार स्थापन और प्रकाश किया था कि जिस पर आधुनिक ज्योतिष
का आधार है और ऐतिहासिक संवत् भी उसी के अनुसार परिवर्तन हुए हैं (देखो एशियाटिक
रिसर्चेज़ पुस्तक ८ पृष्ठ २३६-७ See Asiatic Researches Vol VIII. page 236-7.) इस ब्रह्मगुप्त
की गणित में और अन्य ज्योतिषाचार्यों के सिद्धान्तों में कुछ अंतर है कि जिस के लिये अन्य
कोई २ इस ब्रह्मगुप्त को दोष देते हैं कि इस का कुछ विवरण Mr. Samuel Davis मिस्टर सैम्यूएल
डेविस साहब के लिखित हिन्दुओं की ज्योतिष विद्या The Astronomical Computations of the
Hindus नामक लेख के पढने से ज्ञात हो सक्ता है (देखो एशियाटिक रिसर्चेज़ पुस्तक See
Asiatic Researches Vol. II.)
इस संवत् सम्बन्धी झगड़े में हमारा अंतिम निवेदन यह है कि यह पुरातत्वविद्या
ऐसी बड़ी सूक्ष्म और अथाह गहरी है कि जो विद्वान उस में कदाचित् थोड़ा सा भी चूक जावे
तो वह उस में डूब जाता है और उस को खारे पानी के समुद्र में तिरना बहुत कठिन है और
उस में पड़ी हुई किसी वस्तु को वही गोताखोर अर्थात् शोधक निकाल सकता है कि जिसे
धर्मरूपी प्राण को शुद्ध अंतःकरण में स्थिति करके गोता मारने का अभ्यास होता है ॥
३५७ पाठान्तर :-सोमेसर । सोमैस्वर । तस्या । पूर्वे । तयं । गुने । गुणो । पुन्य । जगंन्जता ।
गर्भानं । गर्भान । प्रथ्रिराजयं । पृथुराजयं । पृथीराजये ॥
इस रूपक के शुद्ध और अशुद्ध पाठों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने से ज्ञात हो सक्ता है कि दुष्ट
लेखकों ने उन को कैसे २ भ्रष्ट कर दिये हैं कि जिस के लिये स्वर्ग वासी विचारे चंद को हम लोगों
के दिये अनेक दोष सहने पड़ते हैं ॥

  • देखो मालूम होता है कि चंद यहां अपने बाप का स्पष्ट नाम नहीं लेकर मुहावरे से
    राव शब्द प्रयोग कर राव वेन का निर्देश करता है ॥
    १०