पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)
Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary
महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा
DevanagariHindipublished470 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 119१०८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
१०८ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ आना का दानव को कंदरा में देखना और उसको खड्ग मारने
पर दानव का गाजना ॥
पद्धरी ॥ दिष्यौ सु बीर कंदला गेह । सैं पंच हथ्थ ता हथ्थ देह ॥
असि असी हथ्थ झारच्चि झनंक्क । मन सदस पाइ तो डर षनंक्क ॥ छं० ॥ ५३४॥
अग्रोष्ट उड्ड जठिय अनंक । उठतै सु रोम रोमनि सनंक ॥
बुल्यौ सु बैन निय सत्त मान । देषंत चष्ष वालल्ल विनान ॥ छं० ॥ ५३५ ॥
अति सुषम वचन मधु मधुर कंत । दिष्यौ सु अंस राजन सुभंत ॥
जंभाइ वीर दसनं लहक्क ॥ उठ्यौ सु रोम रोमच्च पहक्क ॥ छं ॥ ५३६ ॥
उर चंपि भग्ग सिर नाइ राज । गहराय इंद्र दांनव सु गांज ॥
छं० ॥ ५३७ ॥ रू० ॥ २७४ ॥
॥ इस पर दानव का आना से उसके मा बाप आदि के नाम पूछना ॥
कवित्त ॥ भेद वचन तन भेद । सुनन पंडुर चढि आइय ॥
उष्ट थरहर कंपि । सुनन प्राक्रम जं इय ॥
चरन सु थिर मन लीन । जीव धर धर धर कांतिय ॥
कैन भाव कवि चंद । बलिय सात्वक रस भांतिय ॥
पुच्छन सु बाल बुल्यौ बलिय । करि सु चिंत अतिंत चित ॥
को मात तात कछि नान को । को साँसूँ साधक सु मति ॥
छं० ॥ ५३८ ॥ रू० ॥ २७५ ॥
॥ ढुंढा दानव का आना के सिर पर हाथ धर गल्ह पूछना ॥
दूहा ॥ खरग हथ्थेनी वाम पर । ढुंढै मेलि अनल्ह ॥
करुना करि सिर हथ्थ धरि । पूछि विवर सब गल्ह ॥
छं० ॥ ५३६ ॥ रू० ॥ २७६ ॥ *
२७४ पाठान्तर :- कंदरा । येह । हथ । हथ । हथ । पाय । टोडर । उठिय । रोमह । बैन । सत । मांति । चषु । विनांन । सुषम । वाचन । करांत । राज राजन । जंभाय । हसनं । लहक । नांइ । गहरा इंद्र द्वा दानव कि माज ॥
२७५ पाठान्तर :- दुर दुर । कंप । प्राकंम । प्राकंप । धरा धर । कांनीय । कौन । भाइ । भांनीय । पुछन । बुल्ल्यौ । चिंत । अत्यंत । चिंत । कुमति ॥
- इस के आगे के अर्थात् रूपक २७६ से २७८ तक सं० १६४७ और १७७० की लिखित