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पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

पृथ्वीराज रासो (सटीक हिन्दी व्याख्या)

Prithviraj Raso by Chand Bardai with Hindi Commentary

महाकवि चन्दबरदाई / कविराज मोहनसिंह द्वारा

DevanagariHindipublished470 पृष्ठ

पृष्ठ 103, कुल 470 में से

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पृष्ठ 103

६२ पृथ्वीराजरासौ । [ आदि पर्व
॥ चालुक का कहना कि रात सें युद्ध नहीं करना प्रात
भये युद्ध करेंगे ॥
दूहा ॥ राज सुनौ चालुक कहै । है थप्पंरि इक्क कंध ॥
राति परी जुध नहि करै । प्रात करैं फिर जुद्ध ॥
छं० ॥ ४६१ ॥ रु० २१८ ॥
॥ दोनों योद्धाओं का अपने २ डेरों पर आना और चालुक
के मंत्रियों का एक झूठी पत्री बनाना ॥
अरिल्ल ॥ अपने अपने डेरा आए । सब घायल के घाव बँधाए ॥
मिले सकल चालुक के मंचिय । झूठी एक बनाई पत्रिय ॥
छं० ॥ ४६२ ॥ रु० ॥ २१८ ॥
॥ चालुक के मंत्रियों का उसे एक झूठी पत्री देकर घर भेज दैना ॥
अरिल्ल ॥ सो कर जाइ राज कै दिन्निय । तुम घर जाहु कहा वक थन्निय ॥
डोली करि चालुक्क चलाए । सब मंची मिलबे कौं आए ॥
छं० ॥ ४६३ ॥ रु० ॥ २२० ॥
॥ चालुक के मंत्रियों का बीसलदेवजी के मंत्रियों से मिल
संधि कर लैना ॥
अरिल्ल ॥ सब मंची परधान थान पर । बोलि लए पावासर तोंअर ॥*
हम सु तुम्हारै पाइन आए । कपट निपट करि राव चलाए ॥
छं० ॥ ४६४ ॥ रु० ॥ २२१ ॥
इक्क सु बोल गज तोल चलावै । राज कहै सो मान्न मँगावैं ॥
छं० ॥ ४६५ ॥ रु० ॥ २२२ ॥
२१८ पाठान्तर :- करें । कहै । भये । करै ॥
२१८-२२ पाठान्तर :- अपनें २ । घाउं । बंधाए । मंत्री । पत्री ॥ २१९ ॥ जायं । दीनीय ।
थंनिय । चालुकं । करी । कों । कूं । आये ॥ २२० ॥ परधांन । यांनं । तुम्हारे । पायन ॥ २२१ ॥
इहां । सोल । चलायौ । मंगायौ । तहं ॥ २२२ ॥
* यह तुक सं० १६४३ और १७७० की पुस्तकों में नहीं है ॥