प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७३
किंच चितिशक्तिरेव भगवती विश्ववमनात् संसारवामाचारत्वाच्च
वामेश्वर्याख्या सती, खेचरी-गोचरी-दिक्धरी-भूचरीरूपैः अशेषैः प्रमातृ-
अन्तःकरण-बहिष्करण-भावस्वभावैः परिस्फुरन्ती, पशुभूमिकायां शून्य-
पदविश्रान्ता किंचित्कर्तृत्वद्यात्मक-कलादिशक्त्यात्मना खेचरीचक्रेण
गोपितपारमार्थिकचिद्गगनचरीत्वस्वरूपेण चकास्ति; भेदनिश्चयाभि-
मान-विकल्पनप्रधानान्तःकरणदेवी रूपेण गोचरीचक्रेण गोपिताभेदनिश्च-
याद्यात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण प्रकाशते; भेदालोचनादिप्रधानबहिष्करण-
देवतात्मना च दिक्धरीचक्रेण गोपिताभेदप्रथात्मकपारमार्थिकस्वरूपेण
स्फुरति; सर्वतो व्यवच्छिन्नाभासस्वभावप्रमेयात्मना च भूचरीचक्रेण
बाह्य इन्द्रियों के रूप में, भूचरी रूप के द्वारा सारे पदार्थों के रूप में प्रकट
होती हुई, पशुदशा (जीवदशा) में शून्यपद में विश्राम करती हुई (अर्थात्
आत्मस्वरूप को गोपन करती हुई) खेचरी चक्र (शक्तिसमूह) के द्वारा अपने
पारमार्थिक चिद्गगनस्वरूप को छिपाती हुई किंचित्कर्तृत्व (थोड़ा-सा करने
की शक्ति-रूपी) कलादिशक्ति के रूप में अवभासित होती है, गोचरीचक्र
(गोचरी शक्ति समूह) के द्वारा अभेदनिश्चयात्मक जो अपना पारमार्थिक
स्वरूप है उसे छिपाकर अन्तःकरण देवी११६ रूप में प्रकाशित होती है
जिसका (जिस अन्तःकरण का) प्रधान व्यापार है भेदका निश्चय (बुद्धि-
द्वारा) भेदाभिमान-अर्थात् भेद से (अनात्म से) तादात्म्य स्थापित करना
(अभिमान-अहंकार द्वारा) भेद-विकल्पन-अर्थात् पदार्थों को भिन्न-भिन्न
रूप से ग्रहण करना (मन द्वारा), दिक्कचरी चक्र (दिक्धरी शक्ति समूह)
द्वारा अपने अभेद को प्रकाश करने वाले पारमार्थिक स्वरूप को छिपा कर
बहिष्करण (बाह्य इन्द्रिय) देवता रूप में प्रकट होती हैं जिसका प्रधान
व्यापार है भेद को ही देखना इत्यादि, भूचरी चक्र (भूचरी शक्ति समूह)
द्वारा अपने सर्वात्म्य स्वरूप को (अर्थात् सभी पदार्थ मैं ही हूँ इस भाव को)
छिपाकर और पशु (जीव) के हृदय को व्यामोहित कर चारों ओर प्रमेयों
(ज्ञेयों) के रूप में भान होती है जिन प्रमेयों का स्वभाव है परस्पर पृथक्
पृथक् रूप में दिखलाई देना।
किन्तु पतिदशा में शक्ति सब कुछ कर डालने वाली चिद्गगनचरी के
रूप में, अभेद का निश्चय इत्यादि करनेवाली गोचरी के रूप में, अभेद का
प्रत्यक्ष इत्यादि सम्पन्न करनेवाली दिक्धरी के रूप में, प्रमेयों को अपने अंग
७४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
गोपितसार्वात्म्यस्वरूपेण पशुहृदयव्यामोहिना भाति । पतिभूमिकायां
तु सर्वकर्तृत्वादिशक्त्यात्मकचिद्गगनचरीत्वेन, अभेदनिश्चयाद्यात्मना
गोचरीत्वेन, अभेदालोचनाद्यात्मना दिक्त्वरीत्वेन, स्वाङ्गकल्पाद्यप्रथा-
सारप्रमेयात्मना च भूचरीत्वेन पतिहृदयविकासिना स्फुरति ! तथा च
उक्तं सहजचमत्कारपरिजनिताकृतकादरेण भट्टदामोदरेण विमुक्तकेषु
'पूर्णविच्छिन्नमात्रान्तर्बहिष्करणभावगाः ।
वामेशाद्याः परिज्ञानाज्ञानात्स्युर्मुक्तिबन्धदाः ॥'
इति एवं च निजशक्तिव्यामोहिततैव संसारित्वम् ।
अपि च चिदात्मनः परमेश्वरस्य स्वा अनपायिनी एकैव स्फुरत्ता-
सारकर्तृत्वात्मा ऐश्वर्यशक्तिः । सा यदा स्वरूपं गोपयित्वा पाशवे पदे
के समान अभिन्न प्रकाश करना जिसका सार है ऐसे सामर्थ्यवाली भूचरी
के रूप में पति (मुक्तदशा के जीव) के हृदय को विकसित करती हुई प्रका-
शित होती है ।
भट्टदामोदर-जिसके प्रति उनके सहज चमत्कार (आध्यात्मिक आनन्द)
से जनित (उत्पन्न) अकृत्रिम (स्वाभाविक) आदर होता है- अपने मुक्त
स्तोत्रों में कहते हैं:-
वामेश्वरी आदि शक्तियां (खेचरी के रूप में) प्रमाता में अवस्थित
होकर, (गोचरी के रूप में) अन्तःकरण में अवस्थित होकर, (दिक्त्वरी के
रूप में) बहिष्करणों (वाह्य इन्द्रियों) में अवस्थित होकर (भूचरी के रूप
में) भावों (पदार्थों) में अवस्थित होकर (जीव को) परिज्ञान (पूर्णज्ञान)
द्वारा पूर्ण बनाते हुए मुक्ति देती हैं और अज्ञान द्वारा उसे अवच्छिन्न
(परिमित) बनाते हुए बन्धन में डालती हैं । इस प्रकार अपनी शक्तियों
द्वारा व्यामोहित हो जाना ही (भ्रान्ति में पड़ जाना ही) संसारदशा है ।
(नीचे आगवोपाय का संकेत है ।)
और भी चित्स्वरूप परमेश्वर की अपनी ऐश्वर्यशक्ति ११७ है जो नाशर-
हित है, अनुपम है, जिसका सार स्फुरता ११८ (प्रकाश) है और जो
कर्तृ तारूप ११९ है । वह (ऐश्वर्यशक्ति) जब अपने (वास्तविक) स्वरूप
को छिपाकर पशु (परिमित प्रमाता बद्धजीव) की अवस्था में प्राण, अपान
प्राणापान-समान-शक्तिदशाभिः जाग्रत्स्वप्न-सुषुप्तभूमिभिः देहप्राण-
पुर्यष्टककलाभिश्च व्यामोहयति, तदा तद्व्यामोहितता संसारित्वम् ;
यदा तु मध्यधामोल्लासाम् उदानशक्तिं, विश्वव्याप्तिसारां च व्यान-
शक्तिं, तुर्यदशारूपां तुर्यातीतदशारूपां च चिदानन्दघनाम् उन्मीलयति,
तदा देहाद्यवस्थायामपि पतिदशात्मा जीवन्मुक्तिर्भवति । एवं त्रिधा
स्वशक्तिव्यामोहितता व्याख्याता । ‘चिद्वत्’ इति (६) सूत्रे चित्प्रकाशो
गृहीतसंकोचः संसारी इत्युक्तम्, इह तु स्वशक्तिव्यामोहितत्वेन अस्य
संसारित्वं भवति,-इति भङ्ग्यन्तरेण उक्तम्। एवं संकुचितशक्तिः प्राणा-
दिमानपि यदा स्वशक्तिव्यामोहितो न भवति, तदा अयम्
‘..................शरीरी परमेश्वरः ।’
इत्याम्नायस्थित्या शिवभट्टारक एव,-इति भङ्ग्या निरूपितं भवति ।
और समान शक्ति१२० की दशाओं से जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति की भूमियों
से, देह, प्राण और पुर्यष्टक१२१ की कलाओं१२२ से व्यामोह उत्पन्न करती
है तो यही व्यामोह संसार की दशा (जन्म-जन्मान्तर में संसरण करते रहना,
(चक्कर काटते रहना ) है । जब वह ( ऐश्वर्यशक्ति ) चिदानन्दघनमय
उदान१२३ शक्ति को जो मध्यधाम१२४ में विलसित होती है और जो तुर्य-
दशावाली१२५ होती है, और चिदानन्दघनमय१२६ व्यानशक्ति को जो सम-
स्त विश्व में व्याप्त हो जाती है और जो तुर्यातीतदशा वाली १२७ होती
है उन्मीलित करती है, तब देह आदि के रहते हुए भी जीव पतिदशा१२८
में पहुँच जाता है और उसकी जीवन में ही मुक्ति हो जाती है ।
इस प्रकार अपनी शक्तियों से ही व्यामोहित हो जाना-इसकी तीन
प्रकार से व्याख्या की गई है ‘चिद्वत्’ १२९ सूत्र में ( सूत्र ६ ) में यह कहा
गया है कि चित्प्रकाश ही संकोच ग्रहण करके संसारी बन जाता है । यहाँ
पर एक दूसरे दृष्टिकोण से यह कहा गया है कि अपनी शक्तियों द्वारा व्या-
मोहित हो जाने से ही जीव की संसारदशा होती है ।
इस प्रकार जिसकी शक्ति संकुचित हो गई है ( अर्थात् अणु, जीव ) वह
जब अपनी शक्तियों से व्यामोहित नहीं होता तब प्राण इत्यादि धारण करते
हुए भी वह आम्नाय की दृष्टि से शरीर धारण किया हुआ परमेश्वर है,
पूज्य शिव ही है—यह प्रकारान्तर से निश्चित रूप से कहा जा सकता है ।
७६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
यदागमः
मनुष्यदेहमास्थाय छन्नास्ते परमेश्वराः ।'
इति । उक्तं च प्रत्यभिज्ञाटीकायाम्
'शरीरमेव घटाद्यपि वा ये षट्त्रिंशत्तत्त्वमयं
शिवरूपतया पश्यन्ति तेऽपि सिध्यन्ति ।'
इति ॥ १२ ॥
उक्तसूत्रार्थप्रातिपक्ष्येण तत्त्वदृष्टिं दर्शयितुमाह
तत्परिज्ञाने चित्तमेव अन्तर्मुखीभावेन
चेतनपदाध्यारोहात् चितिः ॥ १३ ॥
पूर्वसूत्रव्याख्याप्रसङ्गेन प्रमेयदृष्ट्या वितत्य व्याख्यातप्रायमेतत्
सूत्रम्; शब्दसंगत्या तु अधुना व्याख्यायते । 'तस्य' आत्मीयस्य पञ्च-
कृत्यकारित्वस्य 'परिज्ञाने' सति अपरिज्ञानलक्षणकारणापगमात् स्व-
शक्तिव्यामोहिततानिवृत्तौ स्वातन्त्र्यलाभात् प्राक् व्याख्यातं यत् 'चित्तं'
जैसा कि आगम ने कहा है:—
“मनुष्य के देह में स्थित होकर वे छिपे हुए परमेश्वर हैं” और ईश्वर-
प्रत्यभिज्ञा की टीका १३० में कहा गया है:—
“जो छत्तीसतत्त्वमय शरीर अथवा घट इत्यादि को शिव रूप से देखते हैं
वे भी सिद्धि को प्राप्त करते हैं ।” उपर्युक्त सूत्र के अर्थ को विपर्यय द्वारा
तत्त्वदृष्टि को बतलाने के लिए कहते हैं ।
सूत्र १३—उसके पूर्ण ज्ञान होने पर चित्त १३१ ही अन्तर्मुखीभाव से
चेतनपद १३२ पर पहुँच जाने से चिति १३३ हो जाता है ।
भाष्य—ज्ञेय की दृष्टि से पूर्वसूत्र की व्याख्या के प्रसंग में इस सूत्र की
भी विस्तृत रूप से प्रायः व्याख्या हो ही गई है । शब्द संगति से इस सूत्र
की अब व्याख्या की जा रही है । सूत्र में जो तत् शब्द आया है उसका
अर्थ है आत्मा के पंचकृत्य करते रहने का । 'परिज्ञाने' का अर्थ है पूर्णज्ञान
होने पर अर्थात् अज्ञानरूपी कारण के हट जाने पर, अपनी ही शक्ति के
द्वारा व्योमोहित हो जाने के स्वभाव के चले जाने पर स्वातंत्र्य लाभ से,
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७७
तदेव संकोचिनीं बहिर्मुखतां जहत्, 'अन्तर्मुखीभावेन चेतनपदाध्या-
रोहात्, -ग्राहकभूमिकाक्रमाक्रमेण संकोचकलाया अपि विगलनेन
स्वरूपापत्त्या 'चितिर्' भवति; स्वां चिन्मयीं परां भूमिमाश्रयति
इत्यर्थः ॥ १३ ॥
ननु यदि पारमार्थिकं चिच्छक्तिपदं सकलभेदकवलनस्वभावं, तत्
अस्य मायापदेऽपि तथारूपेण भवितव्यं यथा जलदाच्छादितस्यापि
भानोः भावावभासकत्वम् ।-इत्याशङ्क्य आह
चितिवह्निरवरोहपदे छन्नोऽपि मात्रया
मेयेन्धनं प्लुष्यति ॥ १४ ॥
पहले जिस चित्त की (सूत्र ५ में) व्याख्या हो चुकी है वही संकोचस्वभाव-
वाली बहिर्मुखता को छोड़कर, अन्तर्मुखी भाव से चेतनपद पर चढ़कर अर्थात्
क्रम से ज्ञाता (आत्मा) की भूमि तक उठ कर संकोच कला के विगलित
हो जाने पर अपने (वास्तविक) स्वरूप की प्राप्ति से चिति हो जाता है ।
अर्थात् चित्त अपनी चिन्मयी परा भूमि में प्रवेश कर जाता है (चित्त अब
अपनी परम अवस्था चित् में परिणत हो जाता है)।
यहाँ पर एक शंका होती है (ननु) 'यदि पारमार्थिक चित् शक्ति का
ऐसा स्वभाव है कि वह सब भेदों को कवलित कर लेती है तो मायावस्था
में भी उसे वैसाही रहना चाहिए (अर्थात् उसे अपने स्वभाव को नहीं
छोड़ना चाहिए; मायावस्था में भी अभेद की प्रतीति होनी चाहिए) जैसे
मेघ से आच्छादित रहने पर भी सूर्य पदार्थों को प्रकाशित करता ही है ।
(अर्थात् पदार्थों को प्रकाशित करना सूर्य का स्वभाव है और मेघ से
आच्छादित होने पर भी वह अपने इस स्वभाव को नहीं छोड़ता, पदार्थों को
प्रकाशित करता ही रहता है । इसी प्रकार यदि चित् शक्ति का सब भेदों
को विलीन कर अभेद को व्यक्त करना स्वभाव है, तो माया से आच्छादित
रहने पर भी उसे अभेद की प्रतीति करानी चाहिए । यहाँ चिति की उपमा
सूर्य से दी गई है और माया की मेघ से) इस शंका को उठाकर ग्रन्थकार
कहते हैं:—
सूत्र १४-चिति रूपी अग्नि अवरोह पद में (मायासे) आच्छादित
रहने पर भी प्रमेय (ज्ञेय, पदार्थ) रूपी इन्धन को कुछ अंश में (कुछ सीमा
तक) जला देती है ।
७८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
‘चितिरेव’ विश्वग्रसनशीलत्वात् ‘वह्निः’,’ असौ एव ‘अवरोहपदे-
मायाप्रमातृतायां ‘छन्नोऽपि’-स्वातंत्र्यात् आच्छादितस्वभावोऽपि’,
भूरिभूतिच्छन्नाग्निवत् ‘मात्रया’-अंशेन, नीलपीतादिप्रमेयेन्धनं ‘प्लु-
ष्यति’-स्वात्मसात् करोति । मात्रापदस्य इदम् आकूतम्-यत् कवलयन्
अपि सर्वात्म्येन न ग्रसते, अपि तु अंशेन; संस्कारात्मना उत्थापयति ।
ग्रासकत्वं च सर्वप्रमातॄणां स्वानुभवत एव सिद्धम् । यदुक्तं श्रीमदुत्पल-
देवपादैः निजस्तोत्रेषु
‘वर्तन्ते जन्तवोऽशेषा अपि ब्रह्मेन्द्रविष्णवः ।
भाष्य-चिति को यहां वह्नि ( अग्नि ) इसलिए कहा है क्यों कि
( अग्नि के समान ) उसका विश्व को खा जाने का स्वभाव है । यह अवरोह
पद में-( अर्थात् परमशिव पद से नीचे उतरने के समय )-मायाप्रमाता
( वह ज्ञाता जो माया से उपहित है ) की अबस्था में । ‘छन्नोऽपि-अर्थात्
अपने स्वातंत्र्य से ही ( किसी दूसरे से विवश होने पर नहीं ) माया द्वारा
अपने स्वभावके आच्छादित होने पर भी । जैसे आग बहुत राख ( भूरिभूति )
से ढके होने पर भी ( इन्धन को जला देती हैं ) उसी प्रकार ‘चिति (चित्)
शक्ति ) भी माया से ढके होने पर भी मात्रया अर्थात् कुछ अंश में, नील,
पीत इत्यादि प्रमेय रूपी इन्धन को ‘प्लुष्यति’ ‘जला देती हैं’ अर्थात् आत्म-
सात् कर लेती हैं । ( कहने का तात्पर्य यह है कि जब ज्ञेय चिति द्वारा
आत्मसात् कर लिया जाता है अर्थात् जब ज्ञेय ज्ञान बन जाता है, तब
ज्ञेय का ज्ञान से भेद मिट जाता है, तब ज्ञेय ज्ञान का ही अंश हो जाता है )
‘मात्रा’ ( अंश ) शब्द का यहाँ यह भाव है कि चिति ज्ञेय को कवलित
करने पर भी उसे पूर्ण रूप से ग्रसित नहीं कर लेती, किन्तु अंश में ही
ग्रसित करती है ( अंश में ही ग्रसित करती है इसलिए कहा है क्योंकि )
वह उसे ( ज्ञेय ) को संस्कार द्वारा पुनः उत्थापित कर देती है । ( अर्थात्
ज्ञेय पूर्णरूप से ज्ञान में नहीं परिणत हो जाता । वह संस्कार रूप में चित्त
में रहता है और उपयुक्त अवसर पर पुनः ज्ञेय के रूप में प्रकट होता है ) ।
सब प्रमाताओं ( ज्ञाताओं ) में ग्रसन करने की शक्ति है ( अर्थात् ज्ञेय को
ज्ञान बना लेने की शक्ति है ) यह तो प्रत्येक को अपने अनुभव से ही सिद्ध
है । जैसा कि श्रीमदुत्पलदेव१३४ ने अपने स्तोत्रों में कहा है
सभी जीव-ब्रह्मा, विष्णु इन्द्र१३५ विश्व को ग्रसित करते रहते हैं
प्रत्यभिज्ञाहृदय ७६
ग्रसमानास्ततो वन्दे देव विश्वं भवन्मयम् ॥’
इति ॥ १४ ॥
यदा पुनः करणेश्वरीप्रसरसंकोचं संपाद्य सर्गसंहारक्रमपरिशीलन-
युक्तिम् आविशति तदा
बललाभे विश्वमात्मसात्करोति ॥ १५ ॥
चितिरेव देहप्राणाद्याच्छादननिमज्जनेन स्वरूपम् उन्मग्नत्वेन स्फा-
रयन्ती बलम्; यथोक्तं
'तदाक्रम्य बलं मन्त्राः.........।
(अर्थात् सब ज्ञेय को ज्ञान का ही अंश बनाते रहते हैं) इसलिए हे देव मैं
आप के रूप वाले विश्व की बन्दना करता हूँ । (शिवस्तो० २०, १७)
(भाव यह है कि सभी जीव विषयों का आहार करते रहते हैं। आप
विश्व अर्थात् सब कुछ का आहरण कर लेते हैं। इसलिए विश्व आपका
स्वरूप ही है) ।
जब फिर (साधक) इन्द्रिय देवियों के प्रसार का सम्पादन करके क्रम से
सर्ग (भावों वा पदार्थों की सृष्टि अर्थात् बहिःस्थापन) के अभ्यास के उपाय
का आलम्बन करता है और संकोच का सम्पादन करके (अर्थात् इन्द्रियों को
भीतर प्रतिसंहृत करके) संहार (भावों वा पदार्थों वा ज्ञेयों को ज्ञान में परा-
वृत्ति या प्रतिसंहृति) के अभ्यास के उपाय का आलम्बन करता है, तब
सूत्र १५--चिति (चित् शक्ति) के (स्वभावसिद्ध) बल को प्राप्त करने
पर वह (साधक) विश्व को आत्मसात् कर लेता है (अपने स्वरूप में समीकरण
कर लेता है) ।
भाष्य--चिति अर्थात् चित् शक्ति ही का देह, प्राण इत्यादि कोशों को
दबाकर अपने उभार से अपने स्वरूप का उन्मेष 'बल' कहलाता है। जैसा कि
कहा गया है (स्पन्दकारिका निः २ का० १० में) “तब उस (चिति) के बल
को प्राप्त करके मन्त्र१३६ सर्वज्ञ के बल से सम्पन्न हो जाते हैं ई० ।”
६० प्रत्यभिज्ञाहृदय
इति। एवं च 'बललाभे'—उन्मग्नस्वरूपाश्रयणे' क्षित्यादि-सदा-
शिवान्तं 'विश्वम् आत्मसात् करोति'—स्वस्वरूपाभेदेन निर्भासयति।
तदुक्तं पूर्वगुरुभिः स्वभाषामयेषु क्रमसूत्रेषु
'यथा वह्निरुद्धोधितो दाह्यं दहति, तथा
विषयपाशान् भक्षयेत्'
इति।
'न चैवं वक्तव्यम्,—विश्वात्मसात्काररूपा समावेशभूः
कादाचित्की। कथम् उपादेया इयं स्यात् इति; यतो
देहाद्युन्मज्जननिमज्जनवशेन इदम् अस्याः कादाचित्क-
त्वम् इव आभाति। वस्तुतस्तु चितिस्वातंत्र्यावभासि-
तदेहाद्युन्मज्जनात् एव कादाचित्कत्वम्। एषा तु सदैव
प्रकाशमाना; अन्यथा तत् देहादि अपि न प्रकाशेत।
इस प्रकार जब (चिति का) बल प्राप्त हो जाता है अर्थात् जब कोई
अपने उस वास्तविक स्वरूप का आश्रय ग्रहण करता है जो कि अब आविर्भूत
हो गया है, तब वह पृथिवी से लेकर सदाशिव तक सारे विश्व को आत्मसात्
कर लेता है अर्थात् विश्व को अपने स्वरूप से अभिन्न रूप में भासित करता
है। यही बात पूर्व आचार्यों ने क्रमसूत्र में अपने निराले ढंग से कही है।
"जैसे प्रज्वलित आग इन्धन को जला डालती है, वैसे ही साधक को विषय-
बन्धनों को आत्मसात कर लेना चाहिए।"
ऐसा नहीं कहना चाहिए वह समावेश भूमि जिसमें विश्व का आत्म-
सात्कार हो जाता है कभी-कभी ही होती है। तो फिर यह कैसे ग्रहण करने
योग्य मानी जा सकती है। (यह शंका ठीक नहीं है)—क्योंकि देह इत्यादि
के आविर्भाव और तिरोभाव के कारण ही चिति की यह दशा कभी-कभी
होनेवाली (अस्थायी) जैसी लगती है। वस्तुतः समावेशभूमि का कादाचित्कत्व
(कभी-कभी होनेवाली अवस्था) देह इत्यादि के आविर्भाव के ही कारण है
(जिस देह-इ० को) चिति अपने स्वातन्त्र्य से अवभासित करती है। सच बात
तो यह है कि समावेशभूमि सदा प्रकाशमान है। यदि ऐसा न होता, तो देह
६ प्रत्यभिज्ञाहृदय ८१
अत एव देहादिप्रमातृताभिमाननिमज्जनाय अभ्यासः,
न तु सदा प्रथमानतासारप्रमातृताप्राप्त्यर्थम्,
इति श्रीप्रत्यभिज्ञाकाराः ॥ १५ ॥
एवं च
चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्य-
प्रतिपत्तिदार्ढ्यञ्जीवन्मुक्तिः ॥ १६ ॥
विश्वात्मसात्कारात्मनि समावेशरूपे 'चिदानन्दे लब्धे' व्युत्थान-
दशायां दलकल्पतया देहप्राणनीलसुखादिषु आभासमानेषु अपि, यत्स-
मावेशसंस्कारबलात् प्रतिपादयिष्यमाणयुक्तिक्रमोपबृंहितात् 'चिदैकात्म्य-
प्रतिपत्तिदार्ढ्यम्'-अविचला चिदेकत्वप्रथा, सैव 'जीवन्मुक्ति:'-जीवतः
इत्यादि का भी प्रकाश न होता । इसलिए अभ्यास (साधना, योग का
अभ्यास) प्रमाता का जो देह इत्यादि के साथ मिथ्या तादात्म्य है उसे हटाने
के लिए है, उस प्रमातृता (प्रमाता के भाव) को प्राप्त करने के लिए नहीं है
जिसका स्वभाव ही सदा प्रकाशमानता है । यही श्रीप्रत्यभिज्ञाकार का
कहना है।
इस प्रकार-
सूत्र १६-चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर भी
चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है । यही अवस्था जीवन्मुक्ति
(जीते हुए भी मुक्ति का बोध) कहलाती है ।
भाष्य-समावेश१५७ रूप चिदानन्द के प्राप्त होने पर जिसमें समस्त
विश्व से एकात्मता का बोध होता है, व्युत्थानदशा१५८ में परत के समान
देह, प्राण, नील, सुख१५९ इत्यादि का भान होते हुए भी समावेश के संस्कार-
बल से और उस युक्तिक्रम से पुष्ट हो जाने से जिसका प्रतिपादन आगे किया
जायगा जो चित् के साथ तादात्म्य के बोध की दृढ़ता हो जाती है वही
जीवन्मुक्ति है । दृढ़ता का अर्थ है-चित् के साथ एकात्मता के बोध का
अविचल हो जाना । जीवन्मुक्ति का अर्थ है जीते हुए अर्थात् प्राणों को धारण
८२ प्रत्यभिज्ञाहृदय
प्राणान् अपि धारयतो मुक्तिः; प्रत्यभिज्ञातनिजस्वरूपविद्राविताशेष-
पाशराशित्वात् । यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे
'इति वा यस्य संवित्तिः क्रीडात्वेनाखिलं जगत् ।
स पश्यन्सततं युक्तो जीवन्मुक्तो न संशयः ॥'
इति ॥ १६ ॥
अथ कथं चिदानन्दलाभो भवति ?-इत्याह
मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः ॥ १७ ॥
सर्वान्तरतमत्वेन वर्तमानत्वात् तद्भित्तिलग्नतां विना च कस्य-
चित् अपि स्वरूपानुपपत्तेः संविदेव भगवती 'मध्यम्' । सा तु माया-
दशायां तथाभूतापि स्वरूपं गृहयित्वा
'प्राक् संवित्प्राणे परिणता'
इति नीत्या प्राणशक्तिभूमिं स्वीकृत्य, अवरोहक्रमेण बुद्धिदेहादि-
करते हुए भी मुक्ति, क्योंकि उस समय अपने स्वरूप की पहिचान के द्वारा सभी
बन्धन-समूह छिन्न हो जाता है । जैसा कि स्पन्दशास्त्र (वसुगुप्त की स्पन्द-
कारिका नि० २.५) में कहा है "जिसको इस प्रकार का सम्यक् ज्ञान हो जाता
है वह सब जगत् को शिव की क्रीड़ा के रूप में देखते हुए उससे (शिव से) युक्त
रहने के कारण सदा जीते हुए भी मुक्त है । इसमें सन्देह नहीं ।"
तो चिदानन्द का लाभ किस प्रकार होता है ? इसके विषय में सूत्रकार
कहते हैं—
सूत्र १७—मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है ।
भाष्य—भगवती संवित् (चित्-शक्ति) ही 'मध्य'१४० है क्योंकि यही
सब कुछ के अन्तरतम रूप में विद्यमान है और क्योंकि किसी का भी स्वरूप
ही नहीं सम्भव है जब तक कि वह संवित् रूप आश्रय से न लगा हो । उसने
(संवित् ने) इस प्रकार होती हुई भी (अर्थात् सब कुछ का अन्तरतम तथ्य
और आश्रय होते हुए भी) मायादशा में अपने वास्तविक स्वरूप को छिपाते
हुए 'पहले संवित् प्राण में परिणत हुई' इस नीति के अनुसार प्राणशक्ति१४१
भूमि को स्वीकार करके अवरोह क्रम से बुद्धि देह इत्यादि भूमियों में रहती
ष्ठुवम् अधिशयाना, नाडीसहस्रसरणिम् अनुसृता । तत्रापि च पलाश-
पर्णमध्यशाखान्यायेन आब्रह्मरन्ध्रात् अधोवक्त्रपर्यन्तं प्राणशक्ति-
ब्रह्माश्चयमध्यमनाडीरूपतया प्राधान्येन स्थिता; तत एव सर्ववृत्तीनाम्
उदयात्, तत्रैव च विश्रामात् । एवंभूतापि एषा पशूनां निमीलित-
स्वरूपैव स्थिता । यदा तु उक्तयुक्तिक्रमेण सर्वान्तरतमत्वे मध्यभूता
संविद्भगवती विकसति, यदि वा वक्ष्यमाणक्रमेण मध्यभूता ब्रह्मनाडी
विकसति, तदा 'तद्विकासात् चिदानन्दस्य' उक्तरूपस्य 'लाभ:'-प्राप्ति-
र्भवति । ततश्च प्रागुक्ता जीवन्मुक्तिः ॥ १७ ॥
मध्यविकासे युक्तिमाह
विकल्पक्षय-शक्तिसंकोचविकासवाहच्छेदाद्यन्त-
कोटिनिभालनादय इहोपायाः ॥ १८ ॥
'इह' मध्यशक्तिविकासे 'विकल्पक्षयादय उपायाः' । प्रागुपदिष्टपञ्च-
हुई सहस्र नाड़ी के मार्ग का अवलम्बन किया । वहाँ भी (अर्थात् व्यक्ति में भी)
वह मुख्यतः ब्रह्मरन्ध्र १४२ से अधोवक्त्र १४३ तक पलाशपत्र १४४ की मध्य तन्तुके
समान मुख्यतः मध्यम नाड़ी १४५ के रूप में स्थित है जिसका आश्रय प्राणशक्ति
रूपी ब्रह्म है। (उसको मध्यमनाड़ी इसलिए कहते हैं) क्योंकि सभी चित्त-
वृत्तियों का वहीं से उदय होता है और वहीं लय होता है । इस प्रकार होते
हुए भी वह पशुओं के लिए (अर्थात् अज्ञानी जीवों के लिए) अपने स्वरूप को
छिपाये हुए स्थित है। जब कि सबके अन्तरतम में मध्यरूप से रहनेवाली
भगवती संवित् का पहले कहे हुए युक्ति के क्रम से (पंचकृत्य १४६ के अभ्यास से)
विकास होता है अथवा आगे बतलाये जानेवाले क्रम से जब मध्यरूपी ब्रह्म-
नाड़ी १४७ का विकास १४८ होता है, तब उसके विकास से उक्त रूप चिदानन्द का
लाभ अर्थात् प्राप्ति होती है। उसके अनन्तर पूर्ववर्णित जीवन्मुक्ति होती है।
मध्य के विकास में उपाय बतलाते हैं :-
सूत्र १८-विकल्प-क्षय, शक्ति का संकोच और विकास, बाहों का ध्वंस,
आदि और अन्त कोटियों (अन्तों) का अभ्यास इत्यादि यहाँ (मध्य के विकास
में) उपाय हैं।
भाष्य-इह : यहाँ अर्थात् मध्यशक्ति के विकास में विकल्पक्षय आदि
उपाय हैं। यह पहले कहा ही जा चुका है कि संविद् (चेतना) जो कि सब
८४ प्रत्यभिज्ञाहृदय
विधकृत्यकारित्वाद्यनुसरणेन सर्वमध्यभूतायाः संविदो विकासो जायते-
इति अभिहितप्रायम् । उपायान्तरम् अपि तु उच्यते;-प्राणायाम-
मुद्राबन्धादिसमस्तयन्त्रणातंत्रत्रोटनेन सुखोपायमेव, हृदये निहितचित्तः,
उक्तयुक्त्या स्वस्थितिप्रतिबन्धकं विकल्पम् अकिंचिच्चिन्तकत्वेन
प्रशमयन्, अविकल्पपरामर्शेन देहाद्यकलुषस्वचित्प्रमातृतानिभालनप्रवणः,
अचिरादेव उन्मिषद्विकासां तुर्य-तुर्यातीतसमावेशदशाम् आसादयति
तथोक्तम्
'विकल्पहानेनैकाग्र्यात्क्रमेणेश्वरतापदम् ।'
इति श्रीप्रत्यभिज्ञायाम्। श्रीस्पन्देऽपि
'यदा क्षोभः प्रलीयेत तदा स्यात्परमं पदम् ॥'
कुछ का केन्द्र है—का विकास पहले बतलाये हुए पाँच प्रकार के कृत्यों के
करने के अनुसरण से होता है । अब दूसरा उपाय भी बतलाया जा रहा है ।
एक सरल उपाय है जिसके द्वारा प्राणायाम१४९, मुद्रा१५०, बन्ध१५१ इत्यादि
कष्टकर साधनाओं से छुटकारा पाया जा सकता है ।
(वह उपाय यह है)—जब साधक अपने चित्त को हृदय१५२ (संविद्) में
स्थापित अर्थात् एकाग्र करके, बतलाये हुए उपाय से, अपनी वास्तविक दशा
के बाधक विकल्प१५३ को, बिना अन्य किसी प्रकार के चिन्तन के, रोक कर,
अविकल्प के आश्रय के द्वारा, जो देह इत्यादि से दूषित नहीं है ऐसी अपनी
पारमार्थिक चेतना को प्रमाता (वास्तविक ज्ञाता) समझने का अभ्यास कर
लेता है, तब वह शीघ्र ही विकास की ओर उन्मुख हुई तुर्य१५४ और
तुर्यातीत१५५ में समावेश की दशा को प्राप्त कर लेता है जैसा कि श्री ईश्वर
प्रत्यभिज्ञा में कहा गया है :—
“साधक विकल्प के त्याग से और एकाग्रता से, क्रमशः ईश्वरता पद को
प्राप्त कर लेता है (दे० ई० प्र० च० अ०, प्र० आ०, का० ११, ।”
श्री स्पन्द में भी कहा है :—
“जब (मानसिक) क्षोभ लीन हो जाता है, तब परम पद की प्राप्ति होती
है” (दे० स्पन्द का० नि० १ का० ६)
इति। श्रीज्ञानगर्भेऽपि
'विहाय सकलाः क्रिया जननि मानसीः सर्वतो
विमुक्तकरणक्रियानुसृतिपारतन्त्र्योज्ज्वलम्।
स्थितैस्तवदनुभावतः सपदि वेद्यते सा परा
दशा नृभिरतन्द्रितासमसुखामृतस्यन्दिनी ॥'
इति। अयं च उपायो मूर्धन्यत्वात् प्रत्यभिज्ञायां प्रतिपादितत्वात्
आदौ उक्तः। शक्तिसंकोचादयस्तु यद्यपि प्रत्यभिज्ञायां न प्रतिपादिताः,
तथापि आम्नायिकत्वात् अस्माभिः प्रसङ्गात् प्रदर्श्यन्ते; बहुषु हि
प्रदर्शितेषु कश्चित् केनचित् प्रवेक्ष्यति इति।
'शक्तेः संकोच'-इन्द्रियद्वारेण प्रसरन्त्या एव आकुञ्चनक्रमेण
उन्मुखीकरणम्। यथोक्तम् आथर्वणिकोपनिषत्सु कठवल्ल्यां चतुर्थ-
वल्लीप्रथममन्त्रे।
श्री ज्ञानगर्भ में भी (कहा गया हैं) : “हे जननी, जब लोग सारी
मानसिक क्रियाओं को छोड़कर, इन्द्रियों की क्रियाओं की अनुसरण रूपी
परतंत्रता से मुक्त होकर शुद्ध भाव में स्थित होते हैं जब तुम्हारे अनुग्रह से
तत्काल उस उत्कृष्ट दशा की अनुभूति होती है जो कि अक्षुण्ण निरूपम सुख
रूपी अमृत की वर्षा करती है।”
यह उपाय सर्वप्रथम कहा गया है, क्योंकि यह सर्वश्रेष्ठ है और प्रत्यभिज्ञा
शास्त्र में प्रतिपादित हुआ है। शक्ति का संकोच इत्यादि उपाय यद्यपि
प्रत्यभिज्ञा शास्त्र में नहीं प्रतिपादित हुए हैं, तथापि वे आगम की परम्परा
द्वारा विहित हैं, इसलिए प्रसंगवश हम उन्हें भी बतला देते हैं। बहुत से
उपाय बतलाये जाने पर कोई किसी एक उपाय से समावेश दशा में प्रवेश
कर सकेगा।
शक्ति संकोच :- इसका अर्थ है शक्ति का संकोच। इसका भाव है
“इन्द्रियों के द्वारा (विषयों की ओर) जाती हुई शक्ति का आकुंचन क्रम से
(सिकोड़कर, समेट कर) प्रत्यागात्मा की ओर उन्मुख करना”। जैसा
कि अर्थवेद की कठवल्ली-उपनिषद् की चतुर्थवल्ली के प्रथम मंत्र में कहा
गया है :-
८६ प्रत्यभिज्ञाहृदय
'पराञ्चि खानि व्यतृणत्स्वयंभू-
स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्धीरः प्रत्यगात्मानमैक्षद्
आवृत्तचक्षुरमृतत्वमश्नन् ॥'
इति। प्रसृताया अपि वा कूर्माङ्गसंकोचवत् त्राससमये हृत्प्रवेशवच्च
सर्वतो निवर्तनम् । यथोक्तम् ।
'तदपोद्धृते नित्योदितस्थितिः ।'
इति ।
'शक्तेर्विकासः' अन्तर्निगूढाया अक्रममेव सकलकरणचक्रविस्फा-
रणेन
'अन्तर्लक्ष्यो बहिर्दृष्टिर्निमेषोन्मेषवर्जितः ।'
इति। भैरवीमुद्रानुप्रवेशयुक्त्या बहिः प्रसरणम् । यथोक्तं
कक्ष्यास्तोत्रे
"स्वयंभू (आप से आप होनेवाला अर्थात् प्रजापति) ने इन्द्रियों को
बहिर्मुखी बना दिया। इसलिए जीव बाहर की ओर देखता है, अन्तरात्मा
की ओर नहीं। कोई बुद्धिमान व्यक्ति अमृतत्व के अनुभव की इच्छा करता
हुआ आंख को लौटा कर अन्तरात्मा को देखता है।"
अथवा (शक्ति का संकोच हो सकता है) इन्द्रियों की बाहर फैली हुई
शक्ति को चारों ओर से बटोर कर भीतर की ओर पलटना जैसे कछुआ भय
के समय अपने अंगों को सिकोड़ कर भीतर की ओर पलट लेता है। जैसा कि
कहा है "उसके पलटने पर नित्योदित१५७ को स्थिति होती है।"
शक्ति विकास— शक्ति का विकास होता है भीतर छिपी हुई शक्तियों
का एक साथ ही सब इन्द्रियों के प्रसार द्वारा ।
"लक्ष्य भीतर रहे, और दृष्टि बिना निमेष और उन्मेष के (अर्थात्
आंख बिना बन्द या खोले हुए एक टक) बाहर की ओर रहे।" चित्त के
भीतर अनुप्रवेश के साथ इन्द्रियों का बाहर फैलाव यह भैरवी मुद्रा है जैसा
प्रत्यभिज्ञाहृदय ५७
'सर्वाः शक्तीश्चेतसा दर्शनाद्याः
स्वे स्वे वेद्ये यौगपद्येन विष्वक् ।
क्षिप्त्वा मध्ये हाटकस्तम्भभूत-
स्तिष्ठन्विश्वाधार एकोऽवभासि ।"
इति । श्रीभट्टकल्लटेनापि उक्तम्
'रूपादिषु परिणामात् तत्सिद्धिः ।'
इति शक्तेश्च संकोचविकासौ, नासापुटस्पन्दक्रमोन्मिषत्सूक्ष्मप्राण-
शक्त्या भ्रूभेदेन क्रमासादितोर्ध्वकुण्डलिनीपदे प्रसरविश्रान्तिदशापरि-
शीलनम्; अधःकुण्डलिन्यां च षष्ठवक्त्ररूपायां प्रगुणीकृत्य शक्तिं,
तन्मूल-तदग्र-तन्मध्यभूमिस्पर्शविशः । यथोक्तं विज्ञानभट्टारके
'बह्नेर्विषस्य मध्ये तु चित्तं सुखमयं क्षिपेत् ।
कि कक्ष्यास्तोत्र में कहा है—"हे (शिव) दृष्टि इत्यादि सारी शक्तियों को
अपनी चेतना द्वारा अपने अपने विषय में एक साथ चारों ओर फेंक कर
भीतर सुवर्ण स्तम्भ के समान (अचल रूप से) वर्तमान रहते हुए तुम्हीं एक
विश्व के आधार प्रतीत होते हो।"
भट्टकल्लट ने भी कहा है—"रूप इत्यादि के रहते हुए भी परिणाम द्वारा
(अर्थात् रूप इत्यादि के अनुभव के समय जो चेतना बाहर की ओर जाती
हुई प्रतीत होती है उसके विषय में यह बोध बनाये रखना कि यह वही है
जो आन्तरिक चेतना है) उसकी (अर्थात् शक्ति विकास की) सिद्धि होती है।"
शक्ति का संकोच-विकास इस प्रकार होता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी १५८
में प्रसर (फैलाव) और विश्रान्ति (रुकाव) दशा का (मानसिक) अभ्यास
विकास है जो दशा कि सूक्ष्म प्राणशक्ति द्वारा भ्रूभेद से (अर्थात् भौंहों के
बीच के प्राण के निरोध से) क्रमशः प्राप्त होती है और जो सूक्ष्मप्राणशक्ति
नाक के भीतर के वायुस्पन्दन के नियमन से विकसित होती है और शक्ति का
संकोच षष्ठवक्त्ररूपी १५९ (छठें अवयव रूपी) अर्थात् छठें अवयव मेढ्रकन्द में
स्थित अधःकुण्डलिनी १६० में, प्राणशक्ति को पुष्टकर, उसके (अधःकुण्डलिनी
के) मूल, मध्य और अग्रभाग में समावेश है। जैसा कि आदरणीय विज्ञान
भैरव [६८वें श्लोक] में कहा है:—"सुखमय चित्त को 'केवल' रूप में [अर्थात्
८८ प्रत्यभिज्ञाहृदय
केवलं वायुपूर्णं वा स्मरानन्देन युज्यते ॥'
इति । अत्र वह्निः अनुप्रवेशक्रमेण संकोचभूः, विषस्थानम् प्रसरयुक्त्या
विकासपदम्, 'विषॢव्याप्तौ' इति अर्थानुगमात् ।
'बाह्वोः'–वामदक्षिणगतयोः 'छेदो'—हृदयविश्रान्तिपुरःसरम् ।
यथोक्तं ज्ञानगर्भे—
'अनच्चककृतायतिप्रसृतपार्श्वनाडीद्वय-
च्छिदो विधृतचेतसो हृदयपङ्कजस्योदरे ।
उदेति तव दारितान्धतमसः स विद्याङ्कुरो
य एष परमेशतां जनयितुं पशोरप्यलम् ॥
इति ।
विषय सम्बन्ध से रहित] अथवा वायु द्वारा पूर्ण रूप में [अर्थात् मध्य नाड़ी
में स्थित बिना क्रम के उच्चार से स्वररहित व्यंजन मात्र रूप प्राणवायु से
भरे हुए रूप में) वह्नि और विष१६१ के बीच में फेंकना चाहिए (अर्थात्
एकाग्र करना चाहिए) (उस दशा में योगी) स्मरानन्द१६२ अर्थात् कामानन्द
से युक्त होता है।"
यहाँ पर (प्राण के मेढ़कन्द में) प्रवेश की प्रक्रिया से 'वह्नि' संकोचभूमि
है। 'विषस्थान' प्रसर की युक्ति (उपाय) के द्वारा विकासपद है, क्योंकि 'विष'
धातु का अर्थ ही है व्याप्त होना१६३ ।
बाह्वोः=दोनों बाहों का अर्थात् प्राण और अपान का जिनमें से अपान
वामगत (सुषुम्ना की बाईं ओर) है, और प्राण दक्षिणगत (सुषुम्ना की
दाहिनी ओर) है, छेद = हृदय में पहले रोककर अनच्क (स्वर रहित) ककार,
हकार इत्यादि वर्णों के उच्चारण से विच्छेद । जैसा कि ज्ञानगर्भ में कहा है ।
"(हे जगदम्बे) उसके हृदयकमल के भीतर, जिसका चित्त स्थिर हो गया
है, जिसकी दोनों (सुषुम्ना की दोनों ओर की) ओर फैली हुई नाड़ियाँ (अर्थात्
सुषुम्ना की दोनों ओर की ईडा, पिंगला की वायु) बिना स्वर के उच्चरित
ककार के नियंत्रण द्वारा निरुद्ध हो गई हैं, जिसका अंधकारकारक तम विदा-
रित हो गया है, तुम्हारे ज्ञान का वह अंकुर उपजता है जो कि पशु में भी
परमेशत्व उत्पन्न करने के लिए क्षमता रखता है।
(अब सूत्र में जो आद्यन्तकोटिनिभालन पद है उसका अर्थ बतलाते हैं) ।
'आदिकोटिः' हृदयम्, 'अन्तकोटिः' द्वादशान्तः; तयोः प्राणो-
ल्लासविश्रान्त्यवसरे 'निभालनं'-चित्तनिवेशनेन परिशीलनम्। यथोक्तं
विज्ञानभैरवे
'हृद्याकाशे निलीनाक्षः पद्मसंपुटमध्यगः।
अनन्यचेताः सुभगे परं सौभाग्यमाप्नुयात् ॥'
इति। तथा
'यथा तथा यत्र तत्र द्वादशान्ते मनः क्षिपेत् ।
प्रतिक्षणं क्षीणवृत्तेर्वैलक्षण्यं दिनैर्भवेत् ॥'
इति। आदिपदात् उन्मेषदशानिषेवणम् । यथोक्तम्
'उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥'
इति स्पन्दे । तथा रमणीयविषयचर्वणादयश्च संगृहीताः । यथोक्तं
श्रीविज्ञानभैरवे एव
आदि कोटि-हृदय। अन्तकोटि = द्वादश ( बारह अंगुलियों) का अन्तर।
निभालन--इन दोनों (हृदय और द्वादशान्त) में प्राण के उमड़ने और समाप्त
होने के अवसर पर चित्त को लगाने का अभ्यास। जैसा कि विज्ञान भैरव में
कहा है :-
"हे सुभगे (हे सुन्दरि) जिसकी इन्द्रियां हृदयाकाश में लीन हो गई हैं,
जिसका चित्त हृदयकमल के भीतर प्रविष्ट हो गया है, जो और कुछ नहीं
चिन्तन करता है (अर्थात जो एकाग्रचित्त हो गया है), वह परम सौभाग्य
को प्राप्त होता है।" (वि० भै० श्लोक ४६) ।
इसी प्रकार (विज्ञानभैरव में ५१ वें श्लोक में कहा गया है) "जैसे कैसे
भी और जहां कहीं भी यदि कोई अपने चित्त को द्वादशान्त में लगावे तो
प्रतिक्षण उसकी चित्तवृत्ति क्षीण होती जायगी और थोड़े ही दिनों में वह
औरों से विलक्षण हो जायगा ।"
आदि शब्द से (अर्थात् सूत्र में जो आदि शब्द है उससे) उन्मेषदशा का
अभ्यास (समझना चाहिए)। जैसा कहा है (स्प० का० नि० ३ का० ६) ।
"उसको उन्मेष १६७ समझना चाहिए; (कोई) स्वयं उसको देख ले (अर्थात्
उसका स्वयं अनुभव कर ले)" इसी प्रकार रमणीय विषय का आस्वादन इत्यादि
भी 'आदि' पद में संगृहीत है, जैसा कि श्री विज्ञानभैरव में ही कहा है :-
'जग्धिपानकृतोल्लासरसानन्दविजृम्भणात् ।
भावयेद्भूरितावस्थां महानन्दमयो भवेत् ॥
गीतादिविषयास्वादासौख्यैकतात्मनः ।
योगिनस्तन्मयत्वेन मनोरूढेस्तदात्मता ॥
यत्र तत्र मनस्तुष्टिर्मनस्तत्रैव धारयेत् ।
तत्र तत्र परानन्दस्वरूपं संप्रकाशते ।'
इति । एवमन्यदपि आनन्दपूर्णस्वात्मभावनादिकम् अनुमन्तव्यम् ।
इत्येवमादयः अत्र मध्यविकासे उपायाः ॥१८॥
मध्यविकासाच्चिदानन्दलाभः, स एव च परमयोगिनः समावेश-
समापत्त्यादिपर्यायः समाधिः, तस्य नित्योदितत्वे युक्तिमाह
"जब कोई खान-पान से प्रकट होनेवाले आस्वाद के आनन्द के विस्तार
का अनुभव करता है, तो उसे चाहिए कि वह उस आनन्द की पूर्णावस्था
पर ध्यान करे । ऐसा करने से वह महानन्द से परिपूर्ण हो जायगा ।
जब गीतादिविषयों के अनुपम आनन्द से कोई योगी एकात्म हो जाता
है, तब ऐसा एकाग्रचित्त योगी तन्मय होने के कारण उस आनन्द से तादात्म्य
का अनुभव करता है ।
जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता प्राप्त होती है, साधक को चाहिए
कि उसी पर ध्यान लगावे । (ध्यान के अभ्यास से) उसे उसमें से ही परमानन्द
के स्वरूप का भान होगा^{१६८} ।" (वि. भै. ७२, ७३, ७४ श्लोक)
ऐसे ही आनन्दपूर्ण आत्मा की अन्य प्रकार की भावनाओं का अनुमान
किया जा सकता है । सूत्र में जो आदयः (इत्यादि) शब्द आया है वह मध्य
के विकास के लिए इसी प्रकार के उपायों को इंगित करता है ॥१८॥
मध्य के विकास से चिदानन्द का लाभ होता है यही (चिदानन्द का
का लाभ ही) परमयोगी का (वास्तविक) समाधि है जिसके समावेश^{१६९}
समापत्ति इत्यादि समानार्थवाची शब्द हैं । उसके (समाधि के) नित्य प्रकट
रहने का निम्नलिखित उपाय कहते हैं ।
प्रत्यभिज्ञाहृदय [६१]
समाधिसंस्कारवति व्युत्थाने भूयो भूयश्चिदैक्या-
मर्शान्नित्योदितसमाधिलाभः ॥१६॥
आसादितसमावेशो योगिवरो व्युत्थाने अपि समाधिरससंस्कारेण,
क्षीब इव सानन्दं घूर्णमानो, भावराशिं शरदभ्रलवम् इव चिद्गगन
एव लीयमानं पश्यन्, भूयो भूयः अन्तर्मुखताम् एव समवलम्बमानो,
निमीलनसमाधिक्रमेण चिदैक्यमेव विमृशन् व्युत्थानाभिमतावसरे अपि
समाध्येकरस एव भवति । यथोक्तं क्रमसूत्रेषु
'क्रममुद्रया अन्तःस्वरूपया बहिर्मुखः समाविष्टो
भवति साधकः । तत्रादौ बाह्यात् अन्तः प्रवेशः,
आभ्यन्तरात् बाह्यस्वरूपे प्रवेशः आवेशवशात्
जायते;—इति सबाह्याभ्यन्तरोऽयं मुद्राक्रमः'
इति । अत्रायमर्थः सृष्टि-स्थिति-संहृतिसंविच्चक्रात्मकं क्रमं मुद्रयति,
सूत्र १६—समाधि के संस्कार से परिपूर्ण व्युत्थान में बार-बार चित्
(पारमार्थिक चेतना) के साथ अपने ऐक्य का चिन्तन करते रहने से शाश्वत
(सदा प्रकट) समाधि का लाभ होता है ।
भाष्य—श्रेष्ठ योगी जिसने समाधि प्राप्त कर लिया है, समाधि के
आनन्द से संस्कार से मतवाले के समान आनन्द से झूमता हुआ, चिद्गगन में
पदार्थों के समूह को शरदऋतु में बादल के टुकड़े के समान लीयमान देखता
हुआ, बार-बार अन्तर्मुखता का अवलम्बन करता हुआ निमीलन १७० समाधि
की प्रक्रिया द्वारा चित् (परमार्थ चेतना) से अपने ऐक्य का चिन्तन करता
हुआ, जो व्युत्थान १७१ समझा जाता है उस अवसर पर भी, समाधिरस से
अभिन्न ही रहता है । जैसा कि क्रमसूत्र में कहा है :—
साधक अन्तःस्वरूप क्रम मुद्रा १७२ द्वारा बाहर की ओर देखते हुए भी
समावेश की दशा में बना रहता है । इसमें (क्रम मुद्रा में) आवेश के प्रभाव
से पहले चेतना का बाहर से भीतर की ओर प्रवेश होता है और फिर भीतर
से बाहर की ओर प्रवेश होता है । इस प्रकार मुद्राक्रम बाह्य और आभ्यन्तर
दोनों रूप का है ।
यहाँ पर (अर्थात् इस क्रमसूत्र का) यह अर्थ है :—क्रम = सृष्टि स्थिति और
संहार रूपी चक्र अर्थात् फेरा (एक के बाद दूसरा निरन्तर होते रहना) ।
मुद्रा = मुद्रयति अर्थात् जो यह चित्शक्ति (पहले से ही) अपने भीतर स्थित
स्वाधिष्ठितम् आत्मसात् करोति येयं तुरीया चितिशक्तिः, तया
'क्रममुद्रया' ; 'अन्तरिति'—पूर्णाऽहन्तास्वरूपया; 'बहिर्मुख'—इति,
विषयेषु व्याप्रुतः अपि; 'समाविष्टः'—साक्षात्कृतपरशक्तिस्फारः
'साधकः'—परमयोगी भवति। तत्र च 'बाह्याद्' ग्रस्यमानात्
विषयग्रामात् 'अन्तः' परस्यां चिति भूमौ, ग्रसनक्रमेणैव 'प्रवेशः'—
समावेशो भवति। 'आभ्यन्तरात् चितिशक्तिस्वरूपात् च साक्षा-
त्कृतात् 'आवेशवशात्'—समावेशसामर्थ्यात् एव 'बाह्यस्वरूपे'—
इदन्तानिर्भासे विषयग्रामे, वमनयुक्त्या 'प्रवेशः'—चिद्रसाश्यानता-
प्रथनात्मा समावेशो जायते;—इति 'सबाह्याभ्यान्तरः अयं' नित्योदित-
( सृष्टिस्थितिसंहार रूपी क्रम ) को आत्मसात् कर लेती है । (मुद्रा =
मुद्रयति इति मुद्रा अर्थात् आत्मसात् करती है = अपना लेती है) । तया
क्रममुद्रया = उस क्रम मुद्रा द्वारा । उस क्रममुद्रा द्वारा का पूरा अर्थ यह
हुआ कि उस तुरीया चितिशक्ति के द्वारा जो अपने भीतर स्थिति सृष्टि-
स्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित कर लेती है अर्थात् (स्पष्ट रूप से) आत्म-
सात् कर लेती है । अन्तःस्वरूपया = भीतरी स्वरूप से अर्थात् पूर्ण अहन्ता-
रूपी स्वरूप से । बहिर्मुख = विषयों में लगे हुए रहने पर भी । समाविष्टः =
परमशक्ति के विकास को साक्षात् कर लेनेवाला । साधकः = परम् योगी ।
क्रममुद्रया--भवति साधक :-इस पूरे वाक्य का यह अर्थ हुआ “साधक अर्थात्
परमयोगी बहिर्मुख होते हुए भी अर्थात् विषयों में लगे रहने पर भी समाविष्ट
रहता है अर्थात् परमशक्ति के विकास का अनुभव करता रहता है।” किसके
द्वारा ? अन्तःस्वरूप रूपी क्रममुद्रा के द्वारा अर्थात् जो पूर्णाहन्ता स्वरूपवाली
तुरीया चितिशक्ति क्रम को अर्थात् सृष्टिस्थिति-संहार रूपी क्रम को मुद्रित
कर लेती है अर्थात् आत्मसात् कर लेती है, उसके द्वारा ।
इसमें (क्रममुद्रा में) 'बाहर से' अर्थात् उन विषयपुंजों से जो ग्रहण किये
जा रहे हैं 'भीतर' अर्थात् परम चितिभूमि में ग्रहण के द्वारा प्रवेश अर्थात्
समावेश होता है । 'भीतर से' अर्थात् साक्षात् किये हुए चिति शक्तिस्वरूप से
'आवेशवश से' अर्थात् समावेश के प्रभाव से ही बाह्यस्वरूप में अर्थात् विषयपुंज
में जो कि 'यह' के रूप में भासित होता है, वमनयुक्ति से अर्थात् बाहर की
ओर प्रक्षेपण की प्रक्रिया से, 'प्रवेश' अर्थात् चित् रस का घनीभूततारूपी
समावेश होता है । इस प्रकार यह मुद्राक्रम अथवा क्रममुद्रा 'सबाह्यान्तर'
(बाह्य और आन्तरिक दोनों एक साथ) होता है । सबाह्यान्तर का तात्पर्य