प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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अत एव देहादिप्रमातृताभिमाननिमज्जनाय अभ्यासः,
न तु सदा प्रथमानतासारप्रमातृताप्राप्त्यर्थम्,
इति श्रीप्रत्यभिज्ञाकाराः ॥ १५ ॥
एवं च
चिदानन्दलाभे देहादिषु चेत्यमानेष्वपि चिदैकात्म्य-
प्रतिपत्तिदार्ढ्यञ्जीवन्मुक्तिः ॥ १६ ॥
विश्वात्मसात्कारात्मनि समावेशरूपे 'चिदानन्दे लब्धे' व्युत्थान-
दशायां दलकल्पतया देहप्राणनीलसुखादिषु आभासमानेषु अपि, यत्स-
मावेशसंस्कारबलात् प्रतिपादयिष्यमाणयुक्तिक्रमोपबृंहितात् 'चिदैकात्म्य-
प्रतिपत्तिदार्ढ्यम्'-अविचला चिदेकत्वप्रथा, सैव 'जीवन्मुक्ति:'-जीवतः
इत्यादि का भी प्रकाश न होता । इसलिए अभ्यास (साधना, योग का
अभ्यास) प्रमाता का जो देह इत्यादि के साथ मिथ्या तादात्म्य है उसे हटाने
के लिए है, उस प्रमातृता (प्रमाता के भाव) को प्राप्त करने के लिए नहीं है
जिसका स्वभाव ही सदा प्रकाशमानता है । यही श्रीप्रत्यभिज्ञाकार का
कहना है।
इस प्रकार-
सूत्र १६-चिदानन्द लाभ होने पर देह इत्यादि का अनुभव होने पर भी
चित् से एकात्मता का बोध दृढ़ हो जाता है । यही अवस्था जीवन्मुक्ति
(जीते हुए भी मुक्ति का बोध) कहलाती है ।
भाष्य-समावेश१५७ रूप चिदानन्द के प्राप्त होने पर जिसमें समस्त
विश्व से एकात्मता का बोध होता है, व्युत्थानदशा१५८ में परत के समान
देह, प्राण, नील, सुख१५९ इत्यादि का भान होते हुए भी समावेश के संस्कार-
बल से और उस युक्तिक्रम से पुष्ट हो जाने से जिसका प्रतिपादन आगे किया
जायगा जो चित् के साथ तादात्म्य के बोध की दृढ़ता हो जाती है वही
जीवन्मुक्ति है । दृढ़ता का अर्थ है-चित् के साथ एकात्मता के बोध का
अविचल हो जाना । जीवन्मुक्ति का अर्थ है जीते हुए अर्थात् प्राणों को धारण