प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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(२) नैयायिक सांसारिक दशा में बुद्धि को ही प्रायः आत्मा मान बैठते हैं ।
मोक्ष के अनन्तर उनका आत्मा शून्यवत् ही हो जाता है ।
(३) मीमांसक भी बुद्धि को ही आत्मा मान बैठते हैं, क्योंकि वह अहंप्रत्यय
को ही आत्मा समझते हैं ।
(४) बौद्ध ज्ञानसन्तति को आत्मा समझते हैं । अतः उनके दर्शन के अनुसार
भी बुद्धि ही आत्मा है ।
(५) कुछ वेदान्ती प्राण को ही आत्मा समझते है ।
(६) कुछ अन्य वेदान्ती और माध्यमिक असत् या शून्य को ही आत्मतत्त्व
समझते हैं ।
(७) पांचरात्र के अनुयायी वासुदेव को ही उत्कृष्ट तत्त्व मानते है ।
(८) सांख्य के अनुयायी विज्ञानाकल की स्थिति को ही परमतत्त्व समझते हैं ।
(६) कुछ वेदान्ती ईश्वरतत्त्व को ही परमतत्त्व समझते हैं ।
(१०) वैयाकरण पश्यन्ती या सदाशिव को ही परमतत्त्व मानते हैं ।
(११) तांत्रिक विश्वोत्तीर्ण आत्मा को परमतत्त्व समझते हैं ।
(१२) कौल आत्मतत्त्व को विश्वमय मानते हैं ।
(१३) त्रिक दर्शन के अनुयायी यह मानते हैं कि आत्मतत्त्व विश्वोत्तीर्ण और
विश्वमय दोनों है ।
कुछ लोग इस सूत्र का अर्थ दूसरे ढंग से करते हैं । उनके अनुसार दर्शन
का अर्थ ज्ञानसरणि नहीं, ज्ञान है । स्थिति का अर्थ अन्तर्मुखी विश्रान्ति है ।
'तद् भूमिकाः' का अर्थ 'चिदानन्दघन की अभिव्यक्ति के उपाय' है । इस अर्थ के
अनुसार नील सुखादि का अनुभव शिव या परमतत्त्व के स्वरूप की अभिव्यक्ति
का उपाय है ।
सूत्र ६—जो चित्स्वरूप है वह शक्ति के संकोच से मलावृत होकर संसारी
बन जाता है ।
इच्छा शक्ति के संकुचित होने पर आणव मल का अविर्भाव होता है
जिससे आत्मा जीव होकर अपने को अपूर्ण मानता है ।
ज्ञानशक्ति के संकोच से मायीय मल का आविर्भाव होता है जिसके
कारण भेद-बुद्धि उत्पन्न होती है । क्रिया शक्ति के संकोच से कार्म मल का
आविर्भाव होता है । इस प्रकार शक्ति के संकोच से सर्वकर्तृत्व किंचित्कर्तृत्व
ग्रहण कर कला बन जाता है, सर्वज्ञत्व किंचित्ज्ञत्व ग्रहण कर विद्या बन