प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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संकोच के द्वारा चिति ( समष्टि चेतना ) ही चित्त ( व्यष्टिचेतना )
बन जाती है ।
जब चिति संकोच ग्रहण करती है तो उसमें या तो (१) चित् का
प्राधान्य अथवा (२) संकोच का प्राधान्य होता है ।
पहली अवस्था में भी जब केवल प्रकाश प्रधान रहता है तब 'विज्ञाना-
कल' का पद होता है और जब प्रकाश और विमर्श दोनों प्रधान रहता है तब
शुद्धविद्याप्रमाता का पद होता है अथवा ईश, सदाशिव, अनाश्रित शिव का
पद होता है । दूसरी अवस्था में शून्य प्रमाता इत्यादि का पद होता है ।
समष्टि चेतना ही संकोच ग्रहण करके चित्त बन जाती है । समष्टि
चेतना के ज्ञान, क्रिया और माया व्यष्टि चेतना में सत्व, रजस् और तमस्
का रूप धारण कर लेते हैं ।
सूत्र ६—माया प्रमाता चित्तमय होता है ।
चित्त ही माया प्रमाता का स्वरूप है ।
सूत्र ७—यद्यपि वह ( आत्मा ) एक है, तथापि द्विरूप, त्रिमय, चतुर्मय
और सात पंचक स्वभाव वाला है ।
चित् स्वयं शिव है । चैतन्य देश और काल से परिच्छिन्न नहीं हो
सकता ।
संकोच के द्वारा चैतन्य ग्राहक और ग्राह्य बन जाता है । इस प्रकार वह
द्विरूप हो जाता है । आणव, मायीय और कार्म्म मल से आच्छन्न होने के
कारण वह त्रिमय हो जाता है । (१) शून्य (२) प्राण (३) पुर्यष्टक और
(४) स्थूल शरीर ग्रहण करने से वह चतुर्मय हो जाता है ।
सात पंचक अर्थात् शिव से नीचे पैंतीस तत्त्व हो जाने का भी उसका
स्वभाव है । शिव से लेकर सकल तक वह सात प्रकार का प्रमाता बनता है
और कला से लेकर नियति तक पांच आवरणों को ग्रहण कर वह पांच स्वरूप
वाला ( जीव ) भी हो जाता है ।
सूत्र ८—सब दर्शनों की स्थितियां उसकी ( आत्मा की ) भिन्न-भिन्न
भूमिकाएं हैं ।
भिन्न-भिन्न दर्शनों की मान्यताएं एक प्रकार से आत्मा द्वारा कल्पित
भूमिकाएं हैं ।
(१) चार्वाक यह मानते हैं कि चैतन्य-विशिष्ट देह ही आत्मा है ।