सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

आचार्य क्षेमराज द्वारा

DevanagariHindipublished187 पृष्ठ

पृष्ठ 36, कुल 187 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 36

( २६ )
सब का केन्द्रभूत शिव या चैतन्य है जो कि उसका आत्मा है । यद्यपि
वस्तुतः उसका आत्मा शिव ही है, तथापि वह आणव मल के कारण परि-
सीमित या अणु के रूप में उसमें रहता है ।
७-बन्ध :-
जीवन का बन्ध जन्मजात अख्याति या अविद्या के कारण है जिसे आणव
मल कहते हैं । यह मल वह आद्य अवच्छेदक उपबन्ध है जिसके द्वारा सर्व-
व्यापी चैतन्य एक अणु या परिसीमित दशा में आ जाता है। यह दशा महेश्वर
की इच्छाशक्ति के संकोच से होती है । इसी के कारण जीव अपने को
सर्वव्यापी चैतन्य से भिन्न एक पृथक् व्यक्ति समझने लगता है । यह आत्म-
परिच्छेद की चेतना है।
८-मोक्ष :-
इस दर्शन में मोक्ष का अर्थ है अपने वास्तविक स्वरूप की प्रत्यभिज्ञा ।
दूसरे शब्दों में अकृत्रिम अहं - विमर्श का उदय मोक्ष है । अकृत्रिम अहं
विमर्श क्या है यह उत्पलदेव के निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट हो जायगा ।
"अहं प्रत्यवमर्शो विमर्शात्मापि वाग्वपुः ।
नासौ विकल्पः, स ह्युक्तो द्वयापेक्षी विनिश्चयः ।"
( ई० प्र० ६ आ० १ )
शुद्ध अहंविमर्श विकल्प नहीं है, क्योंकि विकल्प द्वयापेक्षी या सापेक्ष
होता है । साधारणतः अहंविमर्श या आत्म-बोध अनात्म की विपरीतता की
अपेक्षा से होता है । शुद्ध अहं-विमर्श इस प्रकार सापेक्ष नहीं होता । वह एक
अव्यवहित अपरोक्षानुभूति है । जब इस प्रकार की अनुभूति होती है तभी
अपने वास्तविक स्वरूप का बोध होता है । यही वास्तविक स्वरूप का बोध
ही मोक्ष है । जैसा कि अभिनवगुप्त ने कहा है :-
"मोक्षो हि नाम नैवान्यः स्वरूपप्रथनं हि तत्"
( तं० आ० १, पृ० १६२ )
मोक्ष और कुछ नहीं है, केवल अपने स्वरूप का उन्मेष ही मोक्ष है ।
वास्तविक शुद्ध अहं-विमर्श से चिदानन्द का लाभ होता है । चित्त ही
अब चित् या चिति में परिणत हो जाता है । ( दे० प्र० हृ० सूत्र १३ )
शुद्ध अहं-विमर्श के लाभ होने से शिव-चेतना का उदय होता है जिसमें सारा
विश्व शिवमय या शुद्ध अहंमय प्रतीत होता है ।