प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)
Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary
आचार्य क्षेमराज द्वारा
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शान्तब्रह्मवाद ईश्वराद्वयवाद
७—मोक्षावस्था में विश्व निरस्त मोक्षावस्था में विश्व शिव-चेतना
हो जाता है । या अकृत्रिम अहं-चेतना के रूप में
प्रतीत होता है ।
८—शांकर वेदान्त के अनुसार अद्वैत शैववाद के अनुसार अविद्या
अविद्या विद्या के द्वारा निरस्त हो या अज्ञान दो प्रकार का है-बौद्ध
जाती है, तब मुक्तिलाभ होता है। अज्ञान और पौरुष अज्ञान । बौद्ध
विद्या प्राप्त होती है श्रवण, मनन अज्ञान बुद्धिगत है । पौरुष अज्ञान
और निदिध्यासन द्वारा । स्वरूपगत है । विद्या से केवल बौद्ध
अज्ञान निरस्त होगा । पौरुष अज्ञान
फिर भी शेष रह जायगा । ऐसा
व्यक्ति कोरी शून्यावस्था में पतित
होगा । उसे शिवत्वलाभ नहीं हो
सकता । पौरुष अज्ञान का भी निरसन
आवश्यक है । पौरुष अज्ञान केवल
शक्तिपात द्वारा ही अपसारित हो
सकता है । शक्तिपात या तो सिद्ध
गुरु के द्वारा या साक्षात् भगवदनुग्रह
के द्वारा हो सकता है ।
६-जीव :-
इस दर्शन के अनुसार जीव मन और शरीर का पुतला मात्र नहीं है ।
वह कुछ और भी है । उसका शरीर पञ्च महाभूतों का बना होता है । इसे
स्थूल शरीर कहते हैं । उसके भीतर मन बुद्धि और अहंकार युक्त एक अन्त-
करण भी होता है ।
मन, बुद्धि, अहंकार और पञ्चतन्मात्राएँ इन आठ के समुदाय को
'पुर्यष्टक' कहते हैं । यह सूक्ष्मशरीर है । मृत्यु के समय जीव इसी सूक्ष्मशरीर
में रहता हुआ स्थूलशरीर को छोड़ता है ।
उसके भीतर प्राणशक्ति भी होती है । यह ईश्वरीय शक्ति है जो विश्व
और जीव दोनों में काम करती रहती है । मानव के भीतर कुण्डलिनी शक्ति
भी है जो उसमें सुप्तावस्था में रहती है ।