प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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करेगा और मैं जानते हुए भी इसे नही बता पा रहा हूं । क्योकि,
पिता दशरथ की मृत्यु, माता कैकेयी का राज्यलोभ और वडे भाई
राम का वनवास इन तीनो दोषों को कौन कहेगा । (४)
(प्रवेश करके)
भट - राजकुमार की जय हो ।
भरत-भद्र, क्या शत्रुघ्न मेरे पास श्रा रहे हैं ।
भट- हां, राजकुमार तो श्रापके पास श्रा ही रहे हैं । किन्तु उपाध्यायों ने
श्रापसे कहा है ।
भरत - क्या कहा है, क्या कहा है ?
भट- कृत्तिका का एक दण्ड (६० पल या २४ मिनट का काल=नाडी या
नाडिका) रह गया है । उसके बीत जाने पर रोहिणी मे कुमार
श्रोयोध्या मे प्रवेश करे ।
भरत-बहुत अच्छा । मैंने गुरुजनो के वचन पहले कभी नही टाले । तुम
चलो ।
भट - जैसा राजकुमार श्रादेश देते हैं। (निकल जाता है)
(३) मूल
भरतः- अथ कस्मिन् प्रदेशे विश्रमिष्ये । भवतु दृष्टम् । एतस्मिन्
वृक्षान्तराविष्कृते देवकुले मुहूर्तम् विश्रमयिष्ये । तदुभयं
भविष्यति-दैवतपूजा विश्रमश्च । अथ च उपोपविश्य प्रवेष्ट-
व्यानि नगराणीति सत्समुदाचारः । तस्मात् स्थाप्यताम् रथः ।
सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं स्थापयति)
भरतः- (रथादवतीर्य) सूत ! एकान्ते विश्रामयाश्वान् ।
सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (निष्क्रान्तः)
भरतः- (किञ्चिद गत्वावलोक्य) साधुमुक्तपुष्पलाजाविष्कृता वलयः,
दत्तचन्दनपञ्चाङ्गला भित्तयः, अवसक्तमाल्यदामशोभीनि
द्वाराणि, प्रकीर्णा वालुकाः । किं नु खलु पार्वणोऽयं विशेषः
श्रथवा आह्निक मास्तित्वयम् ? कस्य नु खलु दैवतस्य स्थानं
भविष्यति । नेह किञ्चित् प्रहरणं ध्वजो वा बहिश्चिह्नं
दृश्यते । भवतु प्रविश्य ज्ञास्ये । (प्रविश्यावलोक्य) अहो