प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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(निष्क्रान्तौ)
(प्रवेशकः)
(ततः प्रविशति भरतो रथेन सूतश्च)
भरतः- (सावेगम्) सूत ! चिरं मातुलपरिचयादविज्ञातवृत्तान्तो
ऽस्मि । श्रुतं मया दृढमकल्यशरीरो महाराज इति ।
तदुच्यताम्—
पितुर्मे को व्याधिः
सूतः--हृदयपरितापः खलु महान्
भरतः--किमाहुस्त वैद्या'
सूतः--न खलु भिषजस्तत्र निपुणाः ।
भरतः--किमाहारं भुङ्क्ते शयनमपि
सूतः--भूमौ निरशनः
भरतः-किमाशा स्याद
सूतः--दैव
भरत.---स्फुरति हृदयं वाहय रथम् ॥ (१)
सूतः-यदाज्ञापयत्यायुष्मान् । (रथं वाहयति)
शब्दार्थ—सुधाकार˙ = चूने की कलई आदि से सफेदी करने वाला
सम्मार्जनादीनि = स्वच्छता आदि । कृत्वा = करके अर्थात् झाडू लगाकर
भवतु = ठीक है । कृतम् = कर लिया है । आर्यसम्भपकस्य = पूज्य सम्भप-
का (यह काञ्चुकीय का नाम है) । आज्ञप्तम् = आदेश दिया गया । मुहूर्तम् =
थोडे समय के लिए । स्वप्स्यामि = सोऊँगा । भट˙ = सिपाही । चेटम् उपगम्य
= सेवक के पास जाकर । ताडयित्वा = पीट कर । अंघो = अरे । दास्या पुत्र
= दासी के लड़के (यह सभ्य समाज की गाली है, किसी को "दासी का पुत्र'
कहना उसे गाली देना है, क्योकि इससे उसकी माँ का अपमान झलकता है)
मृते = मरने पर । मोक्ष्यामि - छोड़ू गा । शक्यम् - समर्थ हूँ । भर्त˙ -
स्वामि । अपराधे - दोष । सन्दिष्ट. - आज्ञा दिए गए हो । भर्तृदारकस्य =
राजकुमार । विभ्रष्ट = हटना । कृत ~ होने वाले । प्रतिमागेह = मृत राजाओं
की स्मृति मे जहाँ उनकी प्रतिमाएँ लगाई जाती हैं, उस स्थान को । कौसल्य.