प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
पृष्ठ 88, कुल 296 में से
संदर्भ में पढ़ेंपुरोगैः - कौसल्या जिनके आगे चल रही है, ऐसी । अन्तःपुरैः = रानियों के
द्वारा । आगन्तव्यम् = आना चाहिये । अपनीत = हटाना । कपोतसन्द्वानकं =
कबूतरो के घोसलो को । गर्भगृह = मध्यगृह अर्थात् बीच का भवन । सौध-
[पार्श्व टिप्पणी: पदविज्ञात-] वर्णकदत्त = सुधामय (सफेद) रग से पोतना । चन्दनापञ्चाङ्गुला = चन्दन से
[पार्श्व टिप्पणी: ज इति।] पाँचो अंगुलियो के निशान बनाना । भित्तयः = दीवारे । अवसक्त = संयोजित
करना या लगाना । माल्यदामशोभीनि = फूलों की मालाओ से सुशोभित ।
प्रकीर्णाः = बिखेरी गई । बालुकाः = रेत । विश्वस्तः = पीटने के भय से रहित ।
प्रवेशकः = यह भी विष्कम्भक के समान ही आगे आने वाली घटनाओ के
सक्षिप्त अर्थ का सूचक है । सावेगम् = पीड़ा के साथ । मातुलपरिचयात् =
मामा युधाजित के पास रहने के कारण । अविज्ञातवृत्तान्तः = समाचारो को न
जानने वाला । अस्मि = हूं । दृढम् = नितान्त । अकल्यशरीरः = रोगग्रस्त शरीर
वाले । व्याधिः = रोग । हृदयपरितापः = आधि या मानसिक पीडा । आहुः =
कहा है । भिषजः = वैद्य । भुङ्क्ते = खाते है । निरशनः = निराहार रहने
वाले । दैवम् = कुछ भी नही कहा जा सकता है । स्फुरति = फड़क रहा है ।
वाहय = चलाओ ।
अन्वय—मे पितुः कः व्याधिः, खलु महान् हृदयपरितापः । वैद्याः तम्
किम् आहुः, खलु तत्र निपुणाः भिषज. न । किम् आहारम् भुङ्क्ते शयनम्
अपि (अनुभवति) । भूमौ निरशनः । किम् आशा स्यात् । दैवम् । हृदयम्
स्फुरति, रथम् वाहय । (१)
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद सुधाकार का प्रवेश)
सुधाकार—(झाडू लगा कर) अच्छा, इस समय आर्य संभावक द्वारा बताए
गए सभी कार्य तो कर लिए । अब थोड़ी देर तक सो लूँ । (सोता है)
(प्रवेश करके)
भट—(चेट के पास जाकर और पीट कर) अरे दासी-पुत्र, अब काम क्यों नहीं
करता ? (पीटता है)
सुधाकार—(जाग कर) मार लो, मुझे मार लो ।
भट—मारने पर तुम क्या करोगे ?