प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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राजा—क्या ? केवल मात्र रथ के साथ । (बेहोश होकर गिर जाते हैं)
देवियाँ—महाराज, धैर्य धारण कीजिए, धैर्य धारण कीजिए । (अंगों
का स्पर्श करती है)
काञ्चुकीय—अरे, बड़ा दुःख है । इस प्रकार के महापुरुष भी जब ऐसी
आपत्ति को प्राप्त करते हैं, तो यह सच है कि होनी किसी से नहीं
टाली जा सकती । महाराज, धीरज रखिए, धीरज रखिए ।
राजा—(कुछ संभल कर) हे वाताकि, सुमन्त्र क्या अकेले ही आए हैं ?
काञ्चुकीय—महाराज, और क्या ।
राजा—अरे, बड़ा दुःख है ।
यदि रथ सूना ही आया है, तो मेरे हृदय की इच्छा तो टूट गई । ऐसा
लगता है कि सचमुच मे दशरथ को ले जाने के लिए ही यम
ने रथ भेजा है । (११)
तो उसे जल्दी से बुलाओ ।
काञ्चुकीय - जैसी महाराज की आज्ञा । (निकल जाता है)
राजा—सरोवरों में चलने वाली वे वन की हवाएं सौभाग्यशालिनी हैं, जो
वन में विचरण करने वाले राम को आनन्दपूर्वक छू लेती हैं ।
(इसके बाद सुमन्त्र का प्रवेश)
सुमन्त्र—(चारो ओर देख कर, दुःखपूर्वक)
ये सेवक राम में अनुराग होने के कारण अश्रुपूर्ण नेत्रों वाले,
वेदना से दुःखी बने, कष्ट से तपे अंगों वाले होकर अपने कार्यों का
परित्याग कर, रोते हुए राजा को कोस रहे हैं । (१३)
(पास जाकर) महाराज की जय हो ।
राजा—हे भाई सुमन्त्र,
मेरा बड़ा पुत्र राम कहां है—
नही, नही, मैंने ठीक नहीं कहा ।
हे प्रियसुत सुमन्त्र, तुम्हारा बड़ा लड़का राम कहां है ? गुरुजनों पर
अत्यधिक श्रद्धा रखने वाली, विदेहराज जनक की पुत्री, वह सीता कहां
है ? अथवा सुमित्रा का पुत्र लक्ष्मण कहां है ? क्या उन्होंने सबके लिए
शोकसामर को उपस्थित करने वाले, अब शीघ्र मरने वाले, मुझ
अभागे पिता को भी कुछ कहा है । (१४)