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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 296 में से

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पृष्ठ 73

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नियन्त्रण में रखने वाला। विमत्सर = शत्रुता से रहित। गुर्वनुवृत्तिः = मह
अनुगति अर्थात् आज्ञापालन का भाव। शोकार्तेषु = पीडितों पर। अनुकम्पा =
दया। तृणावद्गणितरा-ज्यैश्वर्यः = राज्यवैभव को तिनके के समान समझने
वाले। असम्बद्धेन = सम्बन्धरहित। कृत्यम् = आचरण। कृतान्तहतक =
दुष्ट यमराज। अनपत्या = सन्तानहीन। परवशं = पराधीन। प्रेक्षितव्या =
देखने योग्य। अस्निग्ध-पुत्रप्रसविनी = प्रेमहीन पुत्र को पैदा करने वाली।
मन्दभागिनी = अधन्य बनी। सारवती = प्रशस्त वस्तु वाली। ज्वलनोपमम् =
अग्नि के समान। सोढुम् = सहन करने के लिए। संहर्तुम् = विनाश करने के
लिए। मुषितेन्द्रियः = ठगी हुई इन्द्रियों वाला। ससम्भ्रमं = सहसा ही।
उपक्रान्तम् = प्रारम्भ किया था। नक्तन्दिवं = रात और दिन।
अन्वय—हा वत्स जगतां नयनाभिराम राम, हा वत्स सलक्षण-
सर्वगात्र लक्ष्मण, हा साध्वि पतिस्थित-चित्तवृत्ते मैथिलि, वत मे तनुजाः हा
हा किल वनं गताः। (४)
अन्वय—रामेण अपि परित्यक्तः लक्ष्मणेन च गर्हितः, त्वया अपि
परित्यक्तः अह लोके अयशोभाजनम्। (५)
अन्वय—सत्यसन्ध, जितक्रोध, विमत्सर, जगत्प्रिय, गुरुशुश्रूषणे युक्त,
मे प्रतिवाक्यं प्रयच्छ। (६)
अन्वय—सूर्यः इव रामः गतः, दिवसः इव लक्ष्मणः सूर्यम् अनुगतः।
सूर्यदिवसावसाने छाया इव सीता न दृश्यते। (७)
अन्वय—वयम् अनपत्याः, रामः अन्यस्य महीपतेः पुत्रः, कैकेयी वने
व्याघ्री च त्वया अद्य किं न कृतम्। (८)
अन्वय—हि अहं मुषितेन्द्रियः अत्यन्तम् असह्यम् ज्वलनोपमं दुःखं
नैव सोढुं नैव संहर्तुम् शक्नोमि। (९)
अन्वय—तव पुत्रः एव सत्पुत्रः, येन वने रघुकुल-श्रेष्ठः रामः
नक्तन्दिवं छायया इव अनुगम्यते। (१०)
हिन्दी अर्थ
(ऊपर कहे गए अनुसार राजा और देवियों का प्रवेश)
राजा—हा वत्स संसार के नेत्रों को अच्छे लगने वाले राम, हा, सुलक्षण
देह वाले वत्स लक्ष्मण, पतिपरायणा तथा विमल चरित्र वाली सीते,
हाय, मेरे प्रिय बच्चे सचमुच वन मे चले गए। (४)