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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 48, कुल 296 में से

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पृष्ठ 48

( 45 )
चेटी—महारानी, मैने ऐसा सुना है । आर्य बालाकि कंचुकी कह रहे
थे—राजतिलक है, राजतिलक है ।
सीता—हां, किसी का राजतिलक होगा ।
(दूसरी चेटी का प्रवेश)
चेटी--महारानी, शुभ समाचार है, शुभ समाचार है ।
सीता--क्या बात है । क्या मन मे रख कर बोल रही है ?
चेटी—सुना है राजकुमार का अभिषेक हो रहा है ।
सीता—पिताजी सकुशल तो है ?
चेटी--महाराज ही तो अभिषेक करा रहे है ।
सीता—यदि ऐसा है, तो मैने दूसरी शुभ सूचना सुनी । अपना
आंचल फैला ।
चेटी--महारानी, जो आज्ञा । (वैसा ही करती है)
सीता—(अपने आभूषण उतार कर देती है ।)
चेटी--महारानी, बाजे की आवाज सी सुन रही हूं ।
सीता—हा, वही है ।
चेटी--अचानक बाजे बजने बन्द हो गये ।
सीता—अभिषेक मे कौन सा विघ्न आ पड़ा ? अथवा राजपरिवारो
मे अनगिनत घटनाएं होती ही रहती है ।
चेटी--महारानी, मैंने ऐसा सुना है कि राजकुमार का तिलक करके महाराजा
वन में चले जायेगे ।
सीता—यदि ऐसा है, तो फिर यह अभिषेक का जल न होकर मुंह
के आंसू धोने का पानी होगा ।
(४) मूल
(ततः प्रविशति रामः)
रामः--हन्त भोः !
आरब्धे पटहे स्थिते गुरुजने भद्रासने लंघिते
स्कन्धोच्चारण-नम्यमानवदन-प्रच्योतितोये घटे ।
राज्ञाहूय विसर्जिते मयि जनो धैर्येण मे विस्मितः
स्वः पुत्रः कुरुते पितुर्यदि वचः कस्तत्र भो विस्मयः ॥ (५)
"विश्रम्यतामिदानीं पुत्रे" ति स्वयं राज्ञा विसर्जित—स्याप-
नीतभारोच्छ्वसितमिव मे मनः । दिष्ट्या स एवास्मि राम.,