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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पृष्ठ 46

(४३) श्री खरतरगच्छीय ज्ञान मन्दिर, जयपुर
शब्दार्थ—अवदातिका=सीता की सखी का नाम । वल्कलम्=वृक्ष की
त्वचा का बना वस्त्र । अत्याहितम् = अति + अहितम् = बहुत बुरा । उपन-
यन्त्या = लाने वाली । हरतः = चुराने वाले का । सपरिवारा = सेविका के
साथ । हञ्जे = अरी (यह स्त्री पात्र द्वारा सेविका आदि के लिए कहा जाने
वाला सम्बोधन है ) । परिशङ्कितवर्णा=मानसिक आशंका से व्याकुल आकार
वाली । इव = समान । परिजन = सेवक । वामहस्तपरिगृहीतम् = बाएं हाथ
मे लिए हुए । नेपथ्यपालिनी = ग्रीन रूम की रक्षा करने वाली । रेवा =
रक्षिका का नाम । निवृत्तरंगप्रयोजनम्=अभिनय का उपयोग समाप्त हो जाने
वाले । किसलयम् = कोमल पत्ते को । निर्यात्य = वापस लौटा दो । तनूरु-
हाणि = शरीर के रोंए । आदर्शम् = कांच को । आर्यवालाकिः = कञ्चुकी का
नाम । प्रियाख्यानिकम् = खुशखबरी । प्रतीष्य = मन में रख कर (उपलब्ध्य) ।
उत्संगम् = गोद या झोली । अवमुच्य = उतार कर । पटहशब्दः = नगाडो
की ध्वनि । एकपदे = शीघ्र । अवघट्टिततूष्णीकः=बजते बजते बन्द होना ।
उद्घात' = विघ्न । बहुवृत्तान्तानि = अनेक प्रकार के कथन वाले । मुखोदकम्=
मुंह के आंसू धोने का जल ।
हिन्दी अर्थ
(इसके बाद अवदातिका वल्कल वस्त्र लिए हुए आती है )
अवदातिका—ओह, बडा बुरा हुआ । विनोद मे भी इस वल्कल वस्त्र को उठा
लाने से जब मै इतनी डर गई हूं, तो लोभ से दूसरो के धन को
हरने वालो की क्या दशा होती होगी । हंसने की इच्छा सी हो
रही है । किन्तु अकेली को नही हंसना चाहिए ।
(इसके बाद सीता सेविका के साथ आती है)
सीता—अरी सखी, अवदातिका कुछ डरी हुई सी दीख रही है । यह
क्या बात है ?
चेटी—महारानी, सेवको से कुछ न कुछ अपराध हो ही जाता है ।
इससे भी कोई अपराध हो गया होगा ।
सीता—नही, नही । वह तो हसना भी चाहती है ।
अवदातिका—(पास जाकर) महारानी की जय हो । महारानी, मैने
कुछ अपराध नहीं किया है ।
सीता—तुम से कौन पूछ रहा है ? अरी अवदातिका, यह तुम्हारे वायें
हाथ मे क्या है ?