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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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पृष्ठ 85

प्रश्न ५ ] शाङ्करभाष्यार्थे ७५

इति पृष्टवते तस्मै स होवाच पिप्पलादः—एतद्वै सत्यकाम ! एतद्ब्रह्म वै परं चापरं च ब्रह्म परं सत्यमक्षरं पुरुषाख्यमपरं च प्राणाख्यं प्रथमजं यत्तदोङ्कार एवोङ्कारात्मकमोङ्कारप्रतीकत्वात्। परं हि ब्रह्म शब्दाद्युपलक्षणानहं सर्वधर्मविशेषवर्जितमतो न शक्यम् अतीन्द्रियगोचरत्वात्केवलेन मनसावगाहितुम् । ओङ्कारे तु विष्ण्वादिप्रतिमास्थानीये भक्त्यावेशितब्रह्मभावे ध्यायिनां तत्प्रसीदति इत्येतदवगम्यते शास्त्रप्रामाण्यात् तथापरं च ब्रह्म । तस्मात्परं चापरं च ब्रह्म यदोङ्कार इत्युपचर्यते। तस्मादेवं विद्वानेतेनैवात्मप्राप्तिसाधनेनैवोङ्काराभिध्यानेन एकतरं परमपरं चान्वेति ब्रह्मानुगच्छति नेदिष्ठं ह्यालम्वनम् ओङ्कारो ब्रह्मणः ॥२॥इस प्रकार पूछनेवाले सत्यकामसे पिप्पलादने कहा — हे सत्यकाम ! यह पर और अपर ब्रह्म; पर अर्थात् सत्य अक्षर अथवा पुरुषसंज्ञक ब्रह्म तथा जो प्रथम विकाररूप प्राण नामक अपर ब्रह्म है वह ओंकार ही है; अर्थात् ओंकाररूप प्रतीकवाला होनेसे ओंकारस्वरूप ही है । परब्रह्म शब्दादिसे उपलक्षित होनेके अयोग्य और सब प्रकारके विशेष धर्मोंसे रहित है; अतः इन्द्रिय-गोचरतासे अतीत होनेके कारण केवल मनसे उसका अवगाहन नहीं किया जा सकता । किन्तु विष्णु आदिकी प्रतिमास्थानीय ओंकारमें जिसमें कि भक्तिके द्वारा ब्रह्म-भावकी स्थापना की गयी है, ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है—यह बात शास्त्र-प्रमाणसे जानी जाती है। इसी प्रकार अपर ब्रह्म भी [ॐकारमें ध्यान करनेवालोंके प्रति प्रसन्न होता है] । अतः पर और अपर ब्रह्म ओंकार ही है—ऐसा उपचारसे कहा जाता है । सुतरां, विद्वान् आत्मप्राप्तिके इस ओंकार-चिन्तनरूप साधनसे ही पर या अपर किसी एक ब्रह्मको प्राप्त हो जाता है, क्योंकि ओंकार ही ब्रह्म-का सबसे अधिक समीपवर्ती आलम्बन है ॥२॥