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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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प्रश्न ४ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ ६३


वर्षशतेनापि श्रुत्यर्थो ज्ञातुं शक्यते सर्वैः पण्डितम्मन्यैः । यथा-हृदयाकाशे पुरीतति नाडीषु च स्वपतस्तत्संबन्धाभावात्ततो विविच्य दर्शयितुं शक्यत इत्यात्मनः स्वयंज्योतिष्ट्वं न बाध्यते । एवं मनस्यविद्याकामकर्मनिमित्तोद्भूतवासनावति कर्मनिमित्ता वासनाविद्ययान्यद्वस्त्वन्तरमिव पश्यतः सर्वकार्यकरणेभ्यः प्रविविक्तस्य द्रष्टुर्वासनाभ्यो दृश्यरूपाभ्योऽन्यत्वेन स्वयंज्योतिष्ट्वं सुदर्पितेनापि तार्किकेण न वारयितुं शक्यते । तस्मात् साधूक्तं मनसि प्रलीनेषु करणेषु अप्रलीने च मनसि मनोमयः स्वप्नान्पश्यतीति ।अर्थ श्रवण कर, क्योंकि अपनेको पण्डित माननेवाले सभी पुरुषोंको सौ वर्षमें भी श्रुतिका अर्थ समझमें नहीं आ सकता । जिस प्रकार [स्वप्नावस्थामें ] हृदयाकाशमें और पुरीतत् नाडीमें शयन करनेवाले आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बाधित नहीं हो सकता, क्योंकि वह उससे सम्बन्ध न रहनेके कारण उससे पृथक् करके दिखलाया जा सकता है उसी प्रकार अविद्या, कामना और कर्म आदिके कारण उद्भूत हुई वासनाओंसे युक्त होनेपर भी मनमें अविद्यावश प्राप्त हुई कर्म-निमित्तक वासनाको अन्य वस्तुके समान देखनेवाले तथा सम्पूर्ण कार्य-करणोंसे पृथग्भूत द्रष्टा आत्माका स्वयंप्रकाशत्व बड़े गर्वीले तार्किकोंद्वारा भी निवृत्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह दृश्यरूप वासनाओंसे भिन्नरूपसे स्थित है । इसलिये यह कहना बहुत ठीक है कि ‘इन्द्रियोंके मनमें लीन हो जानेपर तथा मनके लीन न होनेपर आत्मा मनरूप होकर स्वप्न देखा करता है’ ।