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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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२८प्रश्नोपनिषद्[ प्रश्न २
आवहप्रवहादिभेदः । किं चैष पृथिवी रयिर्देवः सर्वस्य जगतः सन्मूर्तमसदमूर्तं चामृतं च यद्देवानां स्थितिकारणं किं बहुना ॥५॥प्रवह आदि भेदोंवाला वायु है । अधिक क्या यह देव ही पृथिवी और रयि (चन्द्रमा) रूपसे सम्पूर्ण जगत्का धारक और पोषक है । सत्—स्थूल, असत्—सूक्ष्म और देवताओंकी स्थितिका कारणरूप अमृत भी यही है ॥ ५ ॥

प्राणका सर्वाश्रयत्व

अरा इव रथनाभौ प्राणे सर्वं प्रतिष्ठितम् ।
ऋचो यजूंषि सामानि यज्ञः क्षत्रं ब्रह्म च ॥ ६ ॥

जैसे रथकी नाभिमें अरे लगे रहते हैं उसी तरह ऋक्, यजुः, साम, यज्ञ तथा क्षत्रिय और ब्राह्मण—ये सब प्राणमें ही स्थित हैं ॥ ६ ॥

अरा इव रथनाभौ श्रद्धादिनामान्तं सर्वं स्थितिकाले प्राण एव प्रतिष्ठितम् । तथर्चो यजूंषि सामानीति त्रिविधा मन्त्राः तत्साध्यश्च यज्ञः क्षत्रं च सर्वस्य पालयितृ ब्रह्म च यज्ञादिकर्मकर्तृत्वेऽधिकृतं चैवैष प्राणः सर्वम् ॥ ६ ॥जिस प्रकार रथकी नाभिमें अरे लगे होते हैं उसी प्रकार जगत्के स्थितिकालमें [ प्रश्न० ६ । ४ में बतलाये जानेवाले ] श्रद्धासे लेकर नामपर्यन्त सम्पूर्ण पदार्थ प्राणमें ही स्थित हैं । तथा ऋक्, यजुः और साम—तीन प्रकारके मन्त्र, उनसे निष्पन्न होनेवाला यज्ञ, सबका पालन करनेवाले क्षत्रिय और यज्ञादिकर्मोंके अधिकारी ब्राह्मण—ये सब भी प्राण ही हैं ॥ ६ ॥