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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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२६ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न २


सोऽभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इव तस्मिन्नुत्क्रामत्यथेतरे सर्व एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्व एव प्रातिष्ठन्ते । तद्यथा मक्षिका मधुकरराजानमुत्क्रामन्तं सर्वा एवोत्क्रामन्ते तस्मिँश्च प्रतिष्ठमाने सर्वा एव प्रातिष्ठन्त एवं वाङ्मनश्चक्षुःश्रोत्रं च ते प्रीताः प्राणं स्तुन्वन्ति ॥ ४ ॥

तब वह अभिमानपूर्वक मानो ऊपरको उठने लगा । उसके ऊपर उठनेके साथ और सब भी उठने लगे, तथा उसके स्थित होनेपर सब स्थित हो जाते । जिस प्रकार मधुकरराजके ऊपर उठनेपर सभी मक्खियाँ ऊपर चढ़ने लगती हैं और उसके बैठ जानेपर सभी बैठ जाती हैं उसी प्रकार वाक्, मन, चक्षु और श्रोत्रादि भी [ प्राणके साथ उठने और प्रतिष्ठित होने लगे ] । तब वे सन्तुष्ट होकर प्राणकी स्तुति करने लगे ॥ ४ ॥

स च प्राणस्तेषामश्रद्दधानतामालक्ष्याभिमानादूर्ध्वमुत्क्रमत इवेदुत्क्रान्तवानिव सरोषान्निरपेक्षस्तस्मिन्नुत्क्रामति यद्वृत्तं तद्दृष्टान्तेन प्रत्यक्षीकरोति । तस्मिन्नुत्क्रामति सत्यथानन्तरम् एवेतरे सर्व एव प्राणाश्चक्षुरादय उत्क्रामन्त उच्चक्रमिरे । तस्मिंश्च प्राणे प्रतिष्ठमाने तूष्णीं भवति अनुत्क्रामति सति सर्व एव प्रातिष्ठन्ते तूष्णीं व्यवस्थिता अभूवन् ।तब वह प्राण उनकी अश्रद्धालुताको देखकर क्रोधवश निरपेक्ष हो अभिमानपूर्वक मानो ऊपरको उठने लगा । उसके ऊपर उठनेपर जो कुछ हुआ उसे दृष्टान्तसे स्पष्ट करते हैं—उसके ऊपर उठनेके अनन्तर ही चक्षु आदि अन्य सभी प्राण ( इन्द्रियाँ ) उत्क्रमण करने यानी उठने लगे । तथा उस प्राणके ही स्थित होने—चुप होने यानी उत्क्रमण न करनेपर वे सभी स्थित हो जाते—चुपचाप बैठ जाते थे, जैसे कि इस लोकमें