सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

पृष्ठ 31, कुल 131 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 31

प्रश्न १ ] शाङ्करभाष्यार्थ २१


निपातौ—तत्प्रजापतेर्व्रतं प्रजापतिव्रतमृतौ भार्यागमनं चरन्ति कुर्वन्ति तेषां दृष्टफलमिदम् । किम् ? ते मिथुनं पुत्रं दुहितरं चोत्पादयन्ते । अदृष्टं च फलमिष्टापूर्तदत्तकारिणां तेषामेव एष यश्चान्द्रमसो ब्रह्मलोकः पितृयाणलक्षणो येषां तपः स्नातकव्रतादीनि, ब्रह्मचर्यम्—ऋतौ अन्यत्र मैथुनासमाशरणं ब्रह्मचर्यम्, येषु च सत्यमनृतवर्जनं प्रतिष्ठितमव्यभिचारितया वर्तते नित्यमेव ॥ १५ ॥ऋतुकालमें स्त्रीगमन करते हैं—यहाँ 'ह' और 'वै' ये निपात प्रसिद्धका स्मरण दिलानेके लिये हैं—उन (ऋतुकालाभिगामियों) को यह दृष्ट फल मिलता है। क्या फल मिलता है ? वे मिथुन यानी पुत्र और कन्या उत्पन्न करते हैं। [इस दृष्ट फलके सिवा] उन इष्ट पूर्त और दत्त कर्मकर्ताओंको, जिनमें कि स्नातकव्रतादि तप, ऋतुकालसे अन्य समय स्त्रीगमन न करनारूप ब्रह्मचर्य और असत्यत्यागरूप सत्य अव्यभिचरितरूपसे प्रतिष्ठित है यह अदृश्य फल मिलता है जो कि चन्द्रलोकमें स्थित पितृयाणरूप ब्रह्मलोक है ॥ १५ ॥

यस्तु पुनरादित्योपलक्षित उत्तरायणः प्राणात्मभावो विरजः शुद्धो न चन्द्रब्रह्मलोकवद्रजस्वलो वृद्धिक्षयादियुक्तोऽसौ तेषां केषामित्युच्यते—किन्तु जो चन्द्रलोकसम्बन्धी ब्रह्मलोकके समान मलयुक्त और वृद्धिक्षय आदिसे युक्त नहीं है बल्कि सूर्यसे उपलक्षित उत्तरायणसंज्ञक विरज—विशुद्ध प्राणात्मभाव है वह उन्हें प्राप्त होता है; किन्हें प्राप्त होता है ? इसपर कहा जाता है—

उत्तरमार्गावलम्बियोंकी गति

तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया चेति ॥ १६ ॥