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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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पृष्ठ 28

१८ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


कृष्णपक्षेऽपीष्टं यागं कुर्वन्ति प्राणव्यतिरेकेण कृष्णपक्षस्तैर्न दृश्यते यस्मात् । इतरे तु प्राणं न पश्यन्तीत्यदर्शनलक्षणं कृष्णात्मानमेव पश्यन्ति । इतरस्मिन् कृष्णपक्ष एव कुर्वन्ति शुक्ले कुर्वन्तोऽपि ॥ १२ ॥ऋषिलोग कृष्णपक्षमें भी [ उसे शुक्लपक्षरूप समझकर ही ] अपना इष्ट—याग किया करते हैं । तथा दूसरे ऋषि प्राणका दर्शन नहीं करते; इसलिये वे सब‌को अदर्शनात्मक कृष्णपक्षरूप ही देखते हैं और शुक्लपक्षमें यागानुष्ठान करते हुए भी इतर यानी कृष्णपक्षमें ही करते हैं ॥ १२ ॥

दिन-रातका प्रजापतित्व

अहोरात्रो वै प्रजापतिस्तस्याहरेव प्राणो रात्रिरेव रयिः प्राणं वा एते प्रस्कन्दन्ति ये दिवा रत्या संयुज्यन्ते ब्रह्मचर्यमेव तद्यद्रात्रौ रत्या संयुज्यन्ते ॥ १३ ॥

दिन-रात भी प्रजापति हैं । उनमें दिन ही प्राण है और रात्रि ही रयि है । जो लोग दिनके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयुक्त होते हैं वे प्राणकी ही हानि करते हैं और जो रात्रिके समय रतिके लिये [ स्त्रीसे ] संयोग करते हैं वह तो ब्रह्मचर्य ही है ॥ १३ ॥

सोऽपि मासात्मा प्रजापतिः स्वावयवेऽहोरात्रे परिसमाप्यते । अहोरात्रो वै प्रजापतिः पूर्ववत् । तस्याप्यहरेव प्राणोऽत्ताग्नी रात्रिरेव रयिः पूर्ववत् । प्राणमहरात्मानं वा एते प्रस्कन्दन्ति निर्गमयन्ति शोषयन्तिवह मासात्मक प्रजापति भी अपने अवयवरूप दिन-रात्रिमें समाप्त हो जाता है । पहलेकी तरह अहोरात्रि भी प्रजापति है—उसका भी दिन ही प्राण—भोक्ता यानी अग्नि है और पूर्ववत् रात्रि ही रयि है । वे लोग दिनरूप प्राणको ही क्षीण करते—निकालते—सुखाते अथवा अपनेसे पृथक् करके