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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

DevanagariHindipublished131 पृष्ठ

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६२ प्रश्नोपनिषद् [ प्रश्न १


संवत्सर ही प्रजापति है; उसके दक्षिण और उत्तर दो अयन हैं। जो लोग इष्टापूर्तरूप कर्ममार्गका अवलम्बन करते हैं वे चन्द्रलोकपर ही विजय पाते हैं और वे ही पुनः आवागमनको प्राप्त होते हैं; अतः ये सन्तानेच्छु ऋषिलोग दक्षिण मार्गको ही प्राप्त होते हैं। [ इस प्रकार ] जो पितृयाण है वही रयि है ॥९॥


तदेव कालः संवत्सरो वै प्रजापतिस्तन्निर्वर्त्यत्वात्संवत्सरस्य। चन्द्रादित्यनिर्वर्त्यतिथ्यहोरात्रसमुदायो हि संवत्सरः तदनन्यत्वाद्रयिप्राणमिथुनात्मक इवेत्युच्यते । तत्कथम् ? तस्य संवत्सरस्य प्रजापतेरयने मार्गौ द्वौ दक्षिणं चोत्तरं च द्वे प्रसिद्धे ह्ययने षण्मासलक्षणे याभ्यां दक्षिणेनोत्तरेण च याति सविता केवलकर्मिणां ज्ञानसंयुक्तकर्मवतां च लोकान् विदधत् ।वह मिथुन ही संवत्सररूप काल है और वही प्रजापति है, क्योंकि संवत्सर उस मिथुनसे ही निष्पन्न हुआ है। चन्द्रमा और सूर्यसे निष्पन्न होनेवाली तिथि और दिन-रात्रिके समुदायका नाम ही संवत्सर है; अतः वह ( संवत्सर ) रयि और प्राणसे अभिन्न होनेके कारण मिथुनरूप ही कहा जाता है। सो किस प्रकार ? उस संवत्सर नामक प्रजापतिके दक्षिण और उत्तर दो अयन—मार्ग हैं। ये छः-छः मासवाले दो अयन प्रसिद्ध ही हैं, जिनसे कि सूर्य केवल कर्मपरायण और ज्ञानसंयुक्त कर्मपरायण पुरुषोंके पुण्यलोकोंका विधान करता हुआ दक्षिण तथा उत्तर मार्गोंसे गमन करता है।
कथम् ? तत् तत्र च ब्राह्मणादिषु ये ह वै तदुपासत इति,सो किस प्रकार ? इसपर कहते हैं—उन ब्राह्मणादिमें जो ऋषिलोग
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