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सर्वकोश
प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

प्रश्नोपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Prashna Upanishad Shankara Bhashya

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

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पृष्ठ 127

प्रश्न ६ ] \hfill शाङ्करभाष्यार्थ \hfill ११७


मोक्षाख्यं महोदधेरिव पारं तार-परपारके समान अपुनरावृत्तिरूप
यस्यस्मानित्यतः पितृत्वं तवास्मान्मोक्षसंज्ञक दूसरे पारपर पहुँचा
प्रत्युपपन्नमितरस्मात् । इतरोऽपिदिया है; अतः आपका पितृत्व तो
हि पिता शरीरमात्रं जनयति ।अन्य ( जन्मदाता ) पिताकी अपेक्षा
तथापि स प्रपूज्यतमो लोकेभी युक्ततर है; क्योंकि दूसरा
किमु वक्तव्यमात्यन्तिकाभय-पिता भी केवल शरीरको ही उत्पन्न
दातुरित्यभिप्रायः । नमः परम-करता है, तो भी वह लोकमें सबसे
ऋषिभ्यो ब्रह्मविद्यासम्प्रदायकर्तृ-अधिक पूजनीय होता है; फिर
भ्यो नमः परमऋषिभ्य इतिआत्यन्तिक अभयप्रदान करनेवाले
द्विर्वचनमादरार्थम् ॥८॥आपके पूजनीयत्वके विषयमें तो
कहना ही क्या है ? अतः ब्रह्मविद्या-
सम्प्रदायके प्रवर्तक परमर्षिको
नमस्कार हो । यहाँ 'नमः परम-
ऋषिभ्यः' इसकी द्विरुक्ति आदर-
प्रदर्शनके लिये है ॥८॥

इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्गोविन्दभगवत्पूज्यपाद-
शिष्यश्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ प्रश्नोपनिषद्भाष्ये
षष्ठः प्रश्नः ॥ ६ ॥


इत्यथर्ववेदीया प्रश्नोपनिषत्समाप्ता ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् ॥